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________________ सन्धि ४ जम्बूसामि-पवजा पाहिडिषि मंडिवि सयल महि धम्में रिसि परमेसा । समिति हि विउलानिधि आयल काले वीर-जिणेसह ॥ध्रुवक।। सेणिउ गउ पुणु वंदण-त्ति । समवसरणु जोयंतर भत्तिइ । पुणु मगहाडि भावें घोसइ। देव चरम केवलि को होसह ॥ भारह-वरिसि गणेसरु भासई। एहु सु विज्जुमालि सुरु दीसइ ॥ भूसिउ अच्छराहिं गुणवंबहि। विज्जुवेय-विज्जुलिया कंतहिं ।। पिक: सालि-छेत्तु जलिओ सिहि । मय-मत्त करिंदु बहु-मय-णिहि ।। देव-दिण्ण-जंबूहल-दायइ । इय सिविणय-दंसणि संजाय ॥ असहयास-बणियहु घण-थणियहि । सुरवरु जिणदासिहि सेहिणियहि ।। सत्तम-दिवसि गभि थाएसइ। जंबू सुरहु पुज्ज पावेसइ ।। . जंबुसामि णाम इहु होसह । तक्कालइ णिन्दुइ जाएसइ ।। वढमाणु पावापुर-सर-वणि । णिद्ध-णील-णय-वरंगुल-तणि ||
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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