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________________ सन्धि ३ वीर-जिणिद-णिव्वाण-पत्ति अंत-तित्थणाहु वि महि विहरिवि । जण दुरियाइँ दुलंघई पहरिवि ।। पावा-पुरवरु पत्ता मणहरि । णव-तरु-पल्लवि वणि बहु-सरवरि ।। संठिन पविमल रयण-सिलायलि। रायहंसु णावइ पंकय दलि॥ दोगिण दियह पविहारु मुएप्पिणु । सुक्क-झाणु तिउजउ झाएपिणु ॥ धत्ता--णिबत्तिइ कत्तिह तम-कसणि पत्र च उद्दसि वासरि । थिइ ससहरि दुइँहरि साइवइ पनिछम-रणिहि अवसरि ||१|| कय-तिजोय-सुगिरोह अणिहउ । किरिया-छिपाइ झाणि परिहिउ ।। णियाघाइ-चक्कु अदेह उ । वसु-सम-गुण-सरीझ णिपणेहउ ।। रिसि-सहसेण समर रय-छिदणु । सिद्धाउ जिणु सिंद्वत्थडु णंदणु ।। तियस-विलासिणिणनिच'उ तालहिं । अमरिंदहि व कुवलय-मालहिं ।। णिन्वुइ चीरि गलिय-मय-रायउ । इंदभूइ गणि केवलि जायउ ।। सो विउलइरिहि गउ णिवाहु । कम्म-विमुक्कउ सासय-ठाणहु ।।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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