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________________ २. ६. २६ } हिन्दी अनुवाद क्षमा-भावोंका पोषण करते हुए तथा पृथ्वीपर बिहार करते हुए वे भगवान् ऋषिराज जृम्भिका नामक ग्रामके अति विकृत ऋजुकुला नदीके विशाल तटवर्ती मनोहर उद्यानमें जहाँ मयूर, शुक और सारस क्रीड़ा कर रहे थे वहाँ मालवृक्षके मूलों पड़ी हुई रत्नशिकार लिासमान दुर ।।५।। भगवान्को केवलज्ञानको उत्पत्ति पापका हरण करनेवाले पष्टोपवास करते हुए तथा तेरह प्रकारके चारित्रका पालन करते हुए भगवान अपनी तपस्यामें लीन रहने लगे। फिर वैशाखमासके शुक्लपक्षको दशमी तिथिको अपराहृमें जब चन्द्र हस्त और उत्तरा फाल्गुनि नक्षत्रके मध्यमें स्थित था तब भगवान्को केवलज्ञानरूपी लक्ष्मीको प्राप्ति हुई । उनके सघन घातिकर्म विनष्ट हो गये । उस समय तीनों लोकोंमें जागृति उत्पन्न हुई । घण्टा, पटह तथा शंखोंकी ध्वनि एवं सिंहनाद करते हुए असंख्य देव आ उपस्थित हुए। उन्होंने महावीर भगबान्की बन्दना की। इन्द्रने भी उनके चरण-युगलमें नमन किया । फिर उन्होंने समवशरणकी रचना की जिसके माध्यमें कामको दूर करनेवाले एवं भुवनके लोगोंको आश्रयभूत भगवान् विराजमान हुए। गौतम गणधर राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक, उस समय इन्द्र प्रसप्तमुख होकर मुझ द्विज-प्रमुखको यहाँ ले आया । उस समय मेरी मति संशयसे भ्रान्त थी, अतएव मैंने जिनेन्द्रसे जीवकी गतिके विषयमें प्रश्न किया। भगवान्ने मेरे संशयको दूर कर दिया, तब मैंने अपनेआपको मुनि-दीक्षासे विभूपित किया। मेरे साथ अन्य पाँच सौ द्विज भी प्रव्रज्या लेकर श्रमण बन गये। तत्पश्चात् श्रावणमासके कृष्णपक्षको प्रतिपदाका दिन आनेपर मुझे चारों प्रकारवी बुद्धि तथा सातों ऋषि-ऋद्धियां भी उत्पन्न हो गयों ॥६॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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