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अंगेष्विवान न्दित सर्वलोक,
तीर्थकरोत्पत्तिपबित्रभूमिः ॥ १.३३ मुनिजनों के बिहार-स्थलों से परिपूत वैशाली नगरी में नागरिकों की सदाशयता, गुणग्राहिता एवं व्यवहार की मधुरता देखते ही बनती है
न तद्गृहं यत्र न सन्ति वृद्धाः, बद्धा न ते ये च न सन्त्युदाराः । उदारता सांपिं विशालताढ्या:, विशालता सापि दयानुबन्धा ।। १.३६
आगे कवि गृहस्थों को समृद्धता एवं सम्पन्नता, किलकारी भरते शिशुओं से भरे उत्सङ्गोंवाली रमणियों की भव्यता का रम्य चित्रण करता है । वे नेत्रों के लिए प्राकर्षक एवं आनन्ददायक हैं
गृहे गृहे तत्र बसन्त्युदाराः, दाराषच ते सन्तिं च दारकाकाः । ते दारकाश्चापि चं कण्ठहारा:,
हाराश्च ते सन्ति च नेत्रहाराः । १.३८ गर्भस्थित तीर्थकर महावीर के प्रभाव से माता त्रिशला के लावण्यमय रूप में जो पावनता थी, जो महनीयता थी- उसका कवि ने मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। पारदकालीन मेघ के समान उसकी प्रभापरिधि के प्रागे राजहंसी भी तिरस्कृत हो जाती है अपने राज-मन्दिर में वह पूर्ण चन्द्र-मण्डल-बाली पूर्णिमा के समान देदीप्यमान हो रही है--
सा शारदीयाम्ब रतुल्यकान्तिः, वपुः प्रभान्यक्कृत राजहंसी । चकास राकेव च पूर्ण चंद्रा,
स्वमन्दिरे लक्तकशोभिपादा ।। २.३३ तीर्थंकर महावीर के जन्म ग्रहण करने पर उनके जन्म के प्रताप से समस्तं जगत' मुख का अनुभव करने लगा। दिशाएँ व आकाश निर्मल थे । शीतल, मन्द एवं सुगन्धित वायु बह रही थी। वायु वेग से नृत्य करती हुई सो लताएं पूरप-वी कर ही श्रीं । संसार में जन-मानस से समस्त विरोध शान्त हो गया था।