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________________ 28 वर्धमानसम्पू: सौमोपरि ह्यस्य विराजमानः पूर्वापरौ तोयनिधो वगाए । विशोभते पद्मजलाशयाङ्कः शैलाधिराजो हिमवान् सुशैलः ॥३२॥ तत्रास्ति भूमण्डलमण्डनं , खंडं तवार्याभिधमुत्तमाङ्गम् । अंगेष्विवानन्वितसर्वलोक, तीर्थंकरोत्पत्तिपवित्रभूमि ।। ३३ ॥ अथार्यखंडालंकारभूता सा मुक्त्यङ्गनालीब वैशाली गणतन्त्रशासनस्य केन्द्रस्वरूपा लिच्छविगणतन्त्रशासनस्य गणनायको निखिलगुणगणपेटको राजासोच् चेटकः । प्रासीवयं सद्गुणानामेव श्रावको न तु दुर्गुणानाम् । कान्ताचरणमग्नोऽप्ययं नातिशयेन कान्ताचरणमग्नः, समन्तभद्रोऽ. इसकी सीमा पर शंलाधिराज हिमवान् नामका पर्वत है । यह पर्वत पूर्व से पश्चिम समुद्र तक फैला हुआ है । इसके बीच में पमहद् नामका एक सरोवर है ।। ३२ ।। इस भरतक्षेत्र में भूमण्डल का अलंकारस्वरूप एक प्रार्यखण्ड है । यह समस्त अंगों में उत्तमांग-मस्तक की तरह श्रेष्ठ माना गया है। यहां की भूमि समय-समय पर तीर्थंकरों के जन्म से पवित्र होती रहती है ।। ३३ ॥ __ आर्यखण्ड' की अलंकारस्वरूपा वह वैशाली मूक्तिरूपी अंगना की सखी के जैसी थी एवं गणतन्त्रशासन की केन्द्र थी। लिच्छविगणतन्त्रशासन के गणनायक शासक के समस्त गुणों के निधिस्वरूप राजा चेटक थे । ये सदगुणों के श्रोता और दुर्गणों के अश्रोता थे। ये कान्ताचरणमग्न शुद्ध निर्दोष आचार-विचार के पालन करने में मग्न होते हुए भी कान्ताचरणमग्न--कान्ता के चरणों की सेवा में ग्रासक्त नहीं थे अर्थात वैषयिक भोगों की गद्धता से विहीन थे । ये समन्तभद्र थे-चारों ओर से इन्हें कल्याण
SR No.090531
Book TitleVardhamanchampoo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Shastri
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages241
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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