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________________ 120 वर्धमामथम्पूः हर्षस्थाने महाशोकः किमर्थं सत्यते त्वया । मातस्त्वमेव धन्यासि ययेवपुत्र उद्गतः ॥ २३ ॥ धन्यस्तेऽयं सुतोऽखुलः, गणनामास्थितौ सुतः सपूतो गदितः स एव यस्मिन् प्रजाते गणनां प्रयाति । वंशोऽयजननीजनhree लोके स्वान्योपकारे सततं सुचित्तः ।। २५ ।। धन्या प्रसूस्त्वमेकैथ येन जननीजनको ।। २४ ।। यस्य कुर्वन्ति कंडूर्य सुरा मुदितमानसाः । वैराग्ये चरतस्तस्य बाधकः को भविष्यति ।। २६ ।। हे माता ! तुम्हें तो बड़ी खुशी होनी चाहिये, फिर हर्ष के स्थान में यह शोक कैसा ? हे माता ! तू धन्य है जिसने ऐसे सुपुत्र को जन्म दिया ।। २३ ।। और यह आपका पुत्र भी धन्य है जिसके समान और पुत्र नहीं । माता-पिता को जो गणनीय पद पर स्थापित कर देता है नही तो सपूत माना जाता है ।। २४ ॥ जिसके जन्म लेने पर वंश की उन्नति हो - ख्याति हो - माता पिता का नाम दुनिया में अमर हो और जो अपने हित के अलावा जगत् का हितकर्ता हो वहीं पुत्र सपूत कहा गया है। यह ग्रापका ऐसा ही पुत्र है ||२५|| जिसकी दासता करके देव अपना अहोभाग्य मानते हैं, भला - सोचो तो सही वैराग्यमार्ग में विचरण करनेवाले उसके रास्ते में कौन बाधा पहुंचा सकता है ? ।। २६ । ! |
SR No.090531
Book TitleVardhamanchampoo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Shastri
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages241
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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