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________________ वाग्मटाजहारः। उदाहरणमाछबावलीबहुलकान्तिरुचो विचित्र भूर्जत्वचा रचितचारुदुकूललीलाः । गुञ्जाफलप्रथितहारलताः सहेल खेलन्ति खेलगतयोऽत्र वने शषर्यः ।।४।। खेलगतयः सबिलासगतयः शचर्योऽत्र बने सहलं सलीलं खेलन्ति दीव्यन्ति । महविली. मिर्मयूरपिच्छाणिमिडुला मदीया कान्तिस्सया रोचन्ते यास्तास्तथा। शेषं सुगमम् । अत्र शबरीयां हीनत्वाझीनामरगादिवर्णना । सक्रियोदाहरणमिदम् । खेलन्सीसि क्रिया ।। ४८ ॥ इस वन में मयूर पिछों से थमी हुई मेखला से सुशोभित, यकशावि से युक्त, रेशमी वकों को धारण करने वाली और गुलाफको से मालाओं को गूंधने बाली भीलनियाँ विष्ठास-क्रीक्षा में मान हैं। टिप्पणी-यहाँ हीनजाति भोलनियों के स्वभाव का वर्णन किया गया है। इसी से इस श्लोक में 'स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥४८॥ अक्रियोदाहरणमाह आरत्तनित्तधोरणिभीसणवअणुकरो कुरङ्गच्छि । उनसिअवीसमुअरणविणिवेसो दसमुहो एसो॥४॥ [ आरक्तनेत्रणिभाषणबदनौकरो कुरझाक्षि । उपसितविंशतिमुजवनविनिवेशरशमुख एषः ॥ ] है कुरङ्गाक्षि, पर दशमुखो रावणः । कीदृशः। आरतनेत्रणिमीषणवदनोकरः उच्चसितविंशतिमुजवनविनिवेशः उहसितं विशतिभुजा एव बने काननं सस्प विनिवेश स्थानम् । अत्रानि याइशो राव,स्तावदेवोक्तदात्वमावोचिः । एषा जातिः। प्रस्ते दमदाहृतम् । यभावा'यमालोक्य स्वप्ने करकलितनिशिफलक मयाडागुन्निद्राः कृतनिजवलाकानविधयः । भुजामध्यादखुबै किमिरमिति दारैरभिहिताः कति बीकामौनव्रतमिएन भेजुः क्षिसिभुजः। अभेके यथा 'शिक्षया प्रमालदाशिष मनूवरम् । निजच्छायासमाविष्ट चावन्कीइति बालकः। आविशवदाम्मतकुपितादिम्बेवमुदायम् ॥ ४५ ॥ हे मृगनयनि ! यह रावन अच्छा भयानक है, क्योंकि रक्तवर्ण नेत्रों से युक्त इसके इस भीषण मुख हैं और इसकी उठी हुई मील मुखार्थे पृषसमूह के समान है। टिप्पणी-इसमें रावण के स्वभाव-कथन से स्वभावोक्ति अलंकार है ॥ ९ ॥
SR No.090529
Book TitleVagbhattalankar
Original Sutra AuthorVagbhatt Mahakavi
AuthorSatyavratsinh
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages123
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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