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________________ चतुर्थः परिच्छेदः। समाम वर्ण 'न' होने से 'सिम्र' अलकार है। यह पोखशवल-पप्रबन्ध-मित्र है, किन्तु कुछ क्षाचार्यों के अनुसार गोमूनिका-यन्धभित्र भी हो सकता है। पोशबछ-पभवनम-चिन्न का रूप निम्न प्रकार होता है ॥ ८॥ षोडशदलपद्मबन्धचित्र 18 | - नयन स्था गोमूत्रिकाबन्धचित्र नए मः| छिन रिच मः -------------- न | ज्ञा न ध्वा न |ध ; नः |रू मः एकस्वरचित्रमाद गणनरगणवरकरतरचरण परपद शरणगजनपथकथक | अमदन गतमद गजकरयमल शममय जय भयघसवनदहन ||३|| हे गणनरगणवर करतरचरण । गणा कषयो नरा मनुष्याश्च क्रियास देवादयः। गणनराणां गणाः समूहास्तेषां परस्म कल्याणस्य करतरी महाष्टं कल्याणकारी चरणो यस्य स सत्संवोधनम् । संश परं पदं यस्य सः। हे शरगजनपथकथक हे शरणागलोकमार्गनिर्देशक 1 श्रमदन निष्काम । हैं गतमद निर्मद। हे गजकरयमल गजकरो इस्तिशुण्ठादण्डस्लवरकर यमलं यस्य सः । एककरशदस्य छोपः । हे शममय । हे भयपनवनदहन । भयमेव
SR No.090529
Book TitleVagbhattalankar
Original Sutra AuthorVagbhatt Mahakavi
AuthorSatyavratsinh
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages123
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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