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________________ सुखीयः परिच्छेषः। भकमलगिरिशहाना नलानां तावशी न शोभा यातनी गन्धकीला क्रीडापदान्तरः संयोजिताना पवति 1 एसौगायमुख्यने ।। ४ || श्रीनेमिनाथ महाराज ने गंधगजों से सुशोभित निवासस्थान और लचमी के क्रीडाकमली से निर्मित छत्रयुक्त (अर्थात् ऐचर्य से परिपूर्ण) राज्य को छोर कर चिरका चमतक नाप पर्वतमा मिना: टिप्पणी-इप लोक में चाताप्रस्यायक 'गन्ध' शब्द के साथ जन्म सुम्बर पर 'इम', 'कीलाम्बुज' शब्द के साथ 'चत्र' और 'की' शब्द के साप 'गि पार में पाया का मापान करते हैं। अतः इसमें 'औधाप' नामक गुण है। समता कान्ति बैंकको के नाम बन्धस्य यस्यैषम्य समता सोच्यते बुधैः । यदुज्वलत्यं तस्यैव सा कान्तिसदिता यथा ।।५।। बन्यस्य पदवेपन्याविषमता सुकमारना सा समता मता। तस्येव बन्धस्य यदुबलवं निर्मकता सा काग्निच्यते ॥ ५॥ ___ बन्ध में पदों के अविषम होने पर जो गुण उत्पन्न होता है उसको 'समता' कहते हैं। और विरुद्ध पन्धि आदि दोनों के स्याग से बन्ध में उबलता था जाने पर कान्ति' गुण उत्पन्न होता है ॥ ५॥ उदाहरणमाह फुचकलशविसारिस्फारलावण्यधारा मनुवदति यदनासचिनी हारवलिः । . असशहिमानं तामनन्योपमेयां कथय कथमह ते घेतसि व्यञ्जयामि || ६ ॥ सा कोदशी वियते पनि केनापि को-पि पाः सन्नुवाच -- मोः, कभए । अहं तां से सब चेतसि का न्यायामि कार्य प्रकटीकरोमि | अनन्योभमैयां श्रन्यामिनधिमीयते इत्यनन्योपमेया नाम् । सोत्तमरूपाभियर्थः । अनशमहिमानं सन्माहारम्याम् । यतकामानिनी बारवलिः यस्या अलमा हारम्ना कुनकलशबिमारिम्फारलावण्यवागमनुवदत्यनुकरोति । कुचबालयाम्मो सनकुभा दिपारगी प्रसरणशाला स्फारोदारा लायधारा सामनु. करोति पर्वविधरूपा न फर्थ व्यायानयित्वा से चेतसि प्रकटयामि । अनोत्कट पदामावासम्पदामाषाच भभवन्धत्वान समता काथिना । पप समतागुणो दिनीया।। ६ || जिस (नायिका) के सस्पल पर लिपटी हुई माला कुम्भ के समान पोन कुचों पर फैली हुई सौन्दर्यामा का अनुकरण करती है, उस बसाधारण महिमा से घुजीर निरुपमा सुन्दरी का वर्णन में किस प्रकार से आपके सम्मुख करूं। टिप्पणी-पहाँ पर 'कुच के साथ 'कलमा', 'बिसारिके साप 'स्मार' मावि ३ का लं
SR No.090529
Book TitleVagbhattalankar
Original Sutra AuthorVagbhatt Mahakavi
AuthorSatyavratsinh
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages123
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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