SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 123
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वाग्भटालार! लाटी हास्यरसे प्रयोगनिपुणे रतिः प्रबन्धे कृता पालाकी करुणा भयानकरसे शान्ते रसे मागभी / गोडी वीररसे च रौद्रजरसे वस्सोमदेशैरवा . बीमसासुतयोविंदर्मविषया कारभूते रसे / / द्वित्रिपदा पाशाली लाटीया पडता वा यावद / शवाः समासवन्तो भवति यथाशक्ति गौडीया // प्रथमपदा पत्सोमी त्रिपदसमा चापि मागषी मवति / उभगोरपि वैदी मुर्मुर्भाषणं कुरुते / / समासेष श्रीवाग्भटालकारटीका। वामय के अभ्यता कपि, प्रजापति (मानर्थयादि) छोपी से रहिस। (ौदार्यादि) गुणों से युक, (उपमादि) भनेक अलमारी से मम में चमत्कार को उत्पन्न करने वाले, (वैवी आदि)रीतियों से शोभित, ( शृद्धारादि)मवरस के कारण तम्मयता को प्राप्त कराने वाले कास्यपुरुष की विकास करम करते रहे // 26 // पचम परिसले समात 21166 समाप्तश्चायं मन्यः
SR No.090529
Book TitleVagbhattalankar
Original Sutra AuthorVagbhatt Mahakavi
AuthorSatyavratsinh
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages123
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy