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तक घुमाने के पश्चात् उसने पूरी शक्ति लगाकर उस चक्र को निक्षेप किया। देखकर लगा-मानो समस्त सूर्य मण्डल जैसे आपतित हो रहा है। उस चक्र ने त्रिपृष्ठकुमार की वज्रमय और शिला-से वक्षदेश पर आघात किया। चक्र के आघात से वे वजाहत की तरह मूच्छित होकर गिर पड़े और चक्र क्या हुआ यह देखने के लिए आकाश में स्थिर हो गया। कुमार को मूच्छित होते देखकर उनकी सेना में हाहाकार मच गया। शत्र के आघात से अपने भाई को मूच्छित होते देख अचलकुमार अनुरागवश आहत न होते हुए भी मूच्छित हो गए। अश्वग्रीव ने सिंह की तरह सिंहनाद किया और उसकी सेना युद्ध जय के उन्माद में 'मारो-मारो' कहकर चिल्लाने लगी। मूहर्त भर में अचलकुमार की संज्ञा लौट आई। उन्होंने पूछा-'यह कैसी ध्वनि है ?' सैनिकों ने कहा-'युवराज त्रिपृष्ठकुमार की मृत्यु से शत्रु-सैन्य आनन्द उन्मत्त होकर इस भाँति जयध्वनि कर रही है।'
(श्लोक ७२४-७३२) - यह सुनकर अचलकुमार क्रुद्ध हो उठे। बोले-'कौन कहता है मेरे भाई की मृत्यु हो गई है ? मेरा भाई युद्ध श्रम से क्लान्त होकर मुहर्त भर के लिए स्व-रथ में विश्राम कर रहा है।' फिर मन ही मन सोचने लगे जब कि यह मृत्यु मृत्यु नहीं है तो क्यों न मैं इनके हर्षोल्लास को स्तिमित करूं ? ऐसा सोचकर वे अश्वग्रीव को सम्बोधित कर बोले-'खड़ा रह अश्वग्रीव ! तुम्हें और तुम्हारे रथ एवं तुम्हारी सेना को मुट्ठी भर पतंगों की तरह अभी अपनी गदा से चूर्ण-विचूर्ण करता हूं।'
(श्लोक ७३३-७३५) ऐसा कहकर उन्होंने रथावर्त पर्वत के शृङ्ग की तरह अपनी गदा उठाई और अश्वग्रीव की ओर दौड़े। उसी मुहूर्त में त्रिपृष्ठकुमार की संज्ञा लौट आई। वे इन्हें रोकते हुए बोले-'ठहरिए आर्य, ठहरिए । मेरे रहते आपका युद्ध करना उचित नहीं है । ऐसा कहकर सोकर जागे हों इस प्रकार वे उठ खड़े हुए। उन्हें उठते देख कर स्वदेशागत व्यक्ति से हठात् मिलन हो गया हो इस प्रकार बाहु प्रसारित कर अचलकुमार ने उन्हें आलिङ्गन में ले लिया। त्रिपृष्ठकुमार को जीवित देखकर उनकी सेना आनन्द से हर्ष ध्वनि करने लगी। वह हर्ष ध्वनि शत्रु सैन्य के हृदय को बींध गई। त्रिपृष्ठकुमार ने चक्र को आकाश में अपने निकट स्थिर हुआ देखा मानो