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________________ पाया।२६८-२९९-३०. क्यन्तरलोकाधिकार २४१ भवनवासी देवों में असुर कुमारों को छोड़कर शेष में से किन्हीं किन्हीं के तीनों प्रकार के निवास स्थान है। अथ निलयत्रयाणां व्यासादिकं गाथात्रयेण कथयति जेडावग्भवणाणं बारसहस्सं तु सुद्ध यणवीसं । बहलं तिसय तिपादं बहलतिभागुदयकूडं च ।।२६८।। ज्येष्वावरभवनयोः द्वादशसहस्र तु शुद्धपश्चविंशतिः । बाहुल्यं त्रिशतं त्रिपाद बाहुल्यत्रिभागोदयफूटं च ।। २६८ ॥ जेट्ठा । ज्येष्ठजघन्यभवनयोनिस्तारो द्वावशसहस्रयोजनानि शुसा पविशतिः, तयोहिल्य त्रिशसयोअमानि त्रिपादोजनं तयोर्मको पल्लाहल्यत्रिभागोमय सास्ति ॥ ३८ ॥ तीन गाथामों द्वारा सीनों निलयों का ध्यासादि कहते हैं: पापार्य-उत्कृष्ट और जघन्य भवनों का विस्तार क्रमशः बारह हजार ( १२००० ) और शुद्ध पच्चीस योमन मात्र है तथा उनका बाहुल्य तीन सो और तिपाद प्रति पौन (३) योजन है। बाहुल्य के तीसरे भाग प्रमाण ऊचे कूट हैं ।। २९८ ।। विशेषार्ष:-भवनों का उत्कृष्ट विस्तार बारह हजार योजन और बाहुल्य तीन सौ योजन हैं। जपन्य विस्तार मात्र २५ योजन और बाहुल्य अर्थात पोन योजन ( तीन कोस ) है। भवनों के मध्य में बाइल्य के तीसरे भाग ( ३००४) अर्थात १०० योजन एवं एक कोस ऊंचे कुट हैं। जेद्वभषणाण परिदो वेदी जोयणदलुच्छिया होदि। भवराणं भवणाणं दंडाणे पण्णुवीसुदया ।। २९९ ।। ज्येष्ठभव नानां परितः वेदी योजनदलोच्छिता भवति । सवराणां भवनानां दण्डाना पञ्चविंशत्युदया ।। २६६ ।। जेष्टु । देवी का द्विषारं सम्बध्यते । मन्यत् छायामावमेवार्थः ॥ २९६ ॥ गाथा :--उत्कृष्ट भवनों के चारों ओर आघायोजन ॐत्री वेदी है तथा जघन्य भवनों के चारों ओर पच्चीम धनुष ऊँची वेदी है ।। २९६ ॥ पट्टादीण पुराणं जोगणलक्खं कमेण एव च | आवासाणं विसयाहियबारसहस्सय तिपादं ।।३०० । वृत्तादीनां पुराण योजनलक्ष क्रमेण एक न। आवामानां द्विशताधिषद्वादशसहनाणि च विपादम ॥३०॥ बट्टा। वृत्तादीना पुराणा योजनसामुस्कृष्टविस्तारः कमेण अघन्यमेकयोमा । वृतादीनामावासानां द्विशताधिकद्वादशसहस्राण्युत्कृयविस्तार: जघन्य त्रिपायमोजन ॥ ३० ॥ ३२
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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