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और अपरिग्रह व्रतों का वर्णन नरेन्द्रसेन अमितगतिके श्रावकाचार जैसा ही किया
है । यथा-
यो यस्य इरते वित्तं स तम्बोन्निरः बहिरंगं हि लोकानां जीवितं वित्तमुच्यते ' ।।
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यो यस्य हरति वित्तं स तस्य जीवस्य जीवितं हरति । आश्वासकरं बाह्यं जीवानां जीवितं वित्तम् ।।
स्तेय और परिग्रहका लक्षण बतलानेवाले सूत्रोंकी व्याख्या में सर्वार्थसिद्धिमें जो शङ्का समाधान किया गया है उसे भी ग्रन्थकारने ज्यों-का-त्यों अपना लिया है ।
चतुर्थ अध्यायमें अणुव्रत और महाव्रतोंका सामान्य निर्देशकर मिथ्यात्व नामक शल्यका कथन करते हुए अनेक दार्शनिक मतोंकी विस्तारपूर्वक चर्चा की है । आत्माको नित्यता, क्षणिकता, बौद्धोंका शून्यवाद, चार्वाकका जड़वाद, सांख्यका कूटस्थ नित्यवाद, मीमांसकोंका सर्वज्ञाभाववाद, वेदकी अपीरुषेयता और जगतत्कर्तृत्ववादको समीक्षा की है। श्वेताम्बर परम्परा द्वारा मान्य केवली - कचलाहार और स्त्रीमुक्तिकी भी आलोचना को गयी है ।
पंचम अध्याय में जीवादि तत्वोंका स्वरूप वर्णित है । जीवका लक्षण और गुण वर्णन करने के पश्चात् उसके कर्तृत्व, अमूर्तत्व, भोक्तृत्व, स्वदेहपरिमाणत्व, उपयोगमयत्व, संसारित्व और ऊर्ध्वगमन घर्मोका वर्णन आया है। इनका समर्थन करते हुए लिखा है कि भाट्ट और नास्तिक जीवको मूर्त मानते हैं, अतएव अमूर्त कहा है । योग शुद्धचैतन्यमय मानते हैं, इसलिए उपयोगमय कहा है । सांख्य जीवको अकर्त्ता मानता है, इसलिए कर्तापद दिया है। योग (नैयायिक) भट्ट (मीमांसक) और साँख्य जीवको व्यापी मानते हैं, इसलिए स्वदेहपरिमाण कहा है । इस अध्यायके अगले संदर्भों का विषय सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिक के द्वितीय अध्यायके समान आया है । नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेपोंका स्वरूप सर्वार्थसिद्धिके समान ही निबद्ध है 1 इस पंचम अध्यायका उत्तराधं तत्त्वार्थसूत्र और उसके टीकाग्रन्थोंके अनुसार लिखा गया है ।
छठे अध्यायमें नरकलोकका वर्णन करते हुए सातों भूमियोंका स्वरूप, नरकपटल एवं नरकों के बिलोंका भी कथन किया गया है। प्रकृति और
१. सिद्धान्तसार संग्रह, ५४ ।
२. अमितगति श्रावकाचार — ६।६१ ।
घर और सारस्वताचार्य : ४३७