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३. आराधनासार
एकसौ पन्द्रह प्राकृत-गाथाओं में यह ग्रन्थ रचा गया है । आराधनाओं का वर्णन करते हुए बताया है
आराहणा इसारो सो दुब्भेओ उत्तो ववहारो चेन
॥
अर्थात् तपाराधना, दर्शनाराधना, ज्ञानाराधना और चारित्राराधना इन चारों का रोग। यार दो प्रकारका है - ( १ ) व्यवहार और (२) परमार्थ । व्यवहार-आराधनाका स्वरूप बतलाते हुए लिखा है कि सूत्र और अर्थ द्वारा कथित वस्तुको ग्रहण करना ज्ञानाराधना है । अर्थात् तीर्थंकरकी वाणी द्वारा प्रतिपादित १९ अंग और १४ पूर्वोको अवगत करना ज्ञानाराधना है। भावशुद्धिपूर्वक १३ प्रकारकं चारित्रका आचरण करना चारित्राराधना है । १३ प्रकारके चारित्रमें ५ महाव्रत, ५ समिति और ३ गुप्तिको स्थान दिया गया है । १२ प्रकारके तपोंका आचरण करनेके लिए प्रवृत्त होना तपाराधना है। इस प्रकार व्यवहार-आराधनाका स्वरूप कथन कर निश्चय आराधनाका स्वरूप बसलाते हुए लिखा है
तब दंसण णाण चरणसभाम
सुद्धणये चउखंषं उत्तं राहणाइ एरिसियं । सम्बवियप्पविमुक्को सुद्धो अप्पा निरालंबो ॥
अर्थात् ज्ञान, दर्शन, चारित्र और सपरूप इन चारों भेद- विकल्पों का त्याग कर पञ्चेन्द्रियके विषयसुखसे रहित निर्विकल्प आत्मतत्त्वका आराधन करना निश्चय - आराधना है। आगे इसीके स्वरूपका विशेषरूप से वर्णन करते हुए बताया है
सद्दहइ सहावं जाणह अप्पाणमप्पणो सुद्धं ।
तं चि य अणुचर पुणो इंदियविसए णि रोहिता ॥
अर्थात् स्वस्वरूपका श्रद्धान करना, शुद्ध आत्माको जानना और निज आत्मरूप आचरण करना एवं निज स्वरूप तपश्चरण करना निश्चयारायना है । निश्चय-आराधनामें इन्द्रियोंकी वृत्तियां रुक जाती हैं और आत्मस्वरूप श्रद्धान, ज्ञान, आचरण और सपाराधना होने लगती है । इसलिए दर्शन, ज्ञान,
१. आधनासार, भाषा २ ।
२. आराघनासार, गाया ८ । ३. वही, गाया ९ ।
श्रुतवर और सारस्वताचार्य : ३७७