SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 163
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ रचना-प्रतिभा स्वामी कार्तिकेयकी रचना-शक्ति शिवार्य ओर कुन्दकुन्दके समान है । विषयको सरल और सुबोध बनानेके लिए उपमानोंका प्रयोग पद-पदपर किया गया है। लेखक जिस तथ्यका प्रतिपादन करना चाहता है, उस तथ्यको बड़ी हो दढ़ताके साथ उपस्थित कर देता है। प्रश्नोत्तर-शैलीमें लिखी गयो गाथाएँ तो विशेष रोचक और महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ उदाहरणार्थ दो गाथाओंका उपस्थित कर लेखककी रचना-प्रतिभाका परिचय प्रस्तुत किया जाता है को ण वसो इत्थिजणे, कस्स ण मयणेण खंडियं माणं । को इंदिएहि पा जियो, को ण कसाएहिं संतत्तो। सो ण वसो इत्थिजणे, सो ण जिओ इंदिएहि मोहेण । जो ण य गिदि गर्थ, अब्भंतर बाहिरं सम्वं ।' इस लोकमें स्त्रीजनके वशमें कौन नहीं ? कामने किसका मान खण्डित नहीं किया ? इन्द्रियोंने किसे नहीं जीता और कषायोंसे कौन सतप्त नहीं हुआ ? ग्रन्थकारने इन समस्त प्रश्नोंका उत्तर सर्कपूर्ण और सुबोध शैलीमें अंकित किया है। वह कहता है, जो मनुष्य बाह्य और आभ्यन्तर संमस्त परिग्रहको ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य न तो स्त्रीजनके वशमें होता है,न कामके अधीन होता है और न मोह और इन्द्रियों के द्वारा हो जोता जा सकता है। __इस ग्रन्थकी अभिव्यंजना बड़ी ही सशक है । ग्रन्थकारने छोटी-सी गाथामें बड़े-बड़े तथ्योंको संजो कर सहजरूपमें अभिव्यक्त किया है। भाषा सरल और परिमार्जित है। शेलीमें अर्थसौष्ठव, स्वच्छता, प्रेषणीयता, सूत्रात्मकता अलंकारात्मकता समवेत है । गद्धपिन्छाचार्य परिचय तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता आचार्य गृद्धपिच्छ हैं । इनका अपरनाम उमास्वामी या उमास्वाति भी प्राप्त होता है। आचार्य वीरसेनने जीवस्थानके काल अनुयोगद्वारमें तत्त्वार्थसूत्र और उसके कर्ता गृद्ध पिच्छाचार्यके नामोल्लेखके साथ उनके तत्त्वार्थसूत्रका एक सूत्र उद्धृत किया है-- __'तह गिद्धपिछाइरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते वि "वर्तनापरिणामक्रियाः पर १. स्वामिकुमार, द्वादशानप्रेक्षा, गाथा २८१२८२ । श्रुतघर और सारस्वताचार्य : १४५
SR No.090508
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages471
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy