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________________ प्रथम दो विषयोंको गाथा इस प्रकारको तटस्थ हैं कि जिनका अभाव खटकता नहीं है। उनके रहनेपर भी प्रवचनसारके विषयमें किसी प्रकारको वृद्धि नहीं होती। नृतीय विभागको चौदह गाथाएँ विचारणीय हैं। ये गाथाएँ निग्रन्थ साधुनोंदे ला चस्पानादिका मागियों के लिए भुस्तिका निषेध करती हैं। इन गाथाओंके विषय यद्यपि कुन्दकुन्दके अन्य ग्रन्थोंके विपरीत नहीं है, पर श्वेताम्बर सम्प्रदाय के विरुद्ध अवश्य हैं। अतः अमृतचन्द्राचार्यके द्वारा इनके छोड़े जानेके सम्बन्धमें डॉ० उपाध्येका कथन है-"अमृप्तचन्द्र इतने आध्यात्मिक व्यक्ति थे कि वे साम्प्रदायिक वाद-विवादमें पड़ना नहीं चाहते थे। अतः इस बातको इच्छा रखते थे कि उनकी टीका सक्षिप्त हो एवं तीक्ष्ण साम्प्रदायिक आक्रमणोंको न करती हुई कुन्दकुन्दके अति उदात्त उद्गारोंके साथ सभी सम्प्रदायों को स्वोकृत हो ।' डॉ. उपाध्येका उपर्युक्त मत सर्वथा समीचीन नहीं है, क्योंकि अमृतचन्द्रने तत्त्वार्थसारके निम्न पद्यमें लिखा है सग्रन्थोऽपि च निर्ग्रन्थो ग्रासाहारी च केवली । रुचिरेवंविधा यत्र विपरीतं हि तत्स्मृतम् ॥' इस पद्यमें श्वेताम्बर मान्यताके केवली-कवलाहार और सचेलकत्वका निषेध किया गया है। अतः श्वेताम्बर मान्यताके सिद्धान्तोंकी समीक्षा छोड़ देने की बात युक्त नहीं है। २. समयसार-यह सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक ग्रन्थ है। यहाँ समयशब्दके दो अर्थ विवक्षित है--समस्त पदार्थ और आत्मा | जिस ग्रन्धमें समस्त पदार्थों अथवा आत्माका सार बणित हो, वह समयसार है। यह भेदविज्ञानका निरूपण करता है। अनेक पदार्थों को 'स्व'-'स्व' लक्षणोंसे पृथक-पृथक नियत कर देना और उनसे उपादेय पदार्थको लक्षित तथा अन्य समस्त पदार्थोको उपेक्षित कर देनेको भेदविज्ञान कहा जाता है। यह ग्रन्थ दश अधिकारोंमें विभक्त है-प्रथम जीवाधिकारमें 'स्व' समय, 'पर' समय, शुद्धनय, आत्मभावना और सम्यक्त्वका प्ररूपण है। जोवको कामभोगविषयक बन्धकथा ही सुलभ है किन्तु आत्माका एकत्व दुर्लभ है। एकत्व-विभक्त आत्माको निजानुभूति द्वारा ही जाना जाता है । जीव प्रमत्त, अप्रमत्त दोनों दशाओंसे पृथक ज्ञायकभावमात्र है । ज्ञानीके दर्शन, ज्ञान, चारित्र व्यवहारसे कहे जाते हैं, निश्चयसे नहीं। निश्चयसे ज्ञानी एक शुद्ध ज्ञायकमान ही है। इस अधिकारमें व्यवहारनयको अभूतार्थ और निश्चयको भूतार्थ कहा है। दूसरे कर्तृकर्माधिकारमें आस्रव, बन्ध आदिकी १. तत्त्वार्थसार, पक्ष, ५।६। ११२ : तीर्थकर महावीर और उनको आचार्य-परम्परा
SR No.090508
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages471
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size10 MB
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