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अतएव ज्ञान और आकारको कथञ्चित् भित्राभिन्न मानना होगा। संक्षेपमें ज्ञानको उत्पत्तिमें अर्थ और आलोक हेतु नहीं हैं । आत्मामें जाननेको क्षमता है और यह क्षमता आवारक कभी के क्षयोपशभपर निर्भर हैं । जिस पस्तुविषयी भानका आवरण दूर हो जाता है, आत्मा उसे बाहरी अर्थ, आलोक आदि कारणोंके विना तथा तदुत्पति और तदाकारताके बिना ही स्वतः जानने लगती है। अतः ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कोंके क्षयोपशमरूप योग्यता ही प्रतिनियत विषयका नियामक है। शान और अनुभूति
स्पर्शन, रसना और घाण ये तीन इन्द्रियाँ भोगी हैं और चक्षु और श्रोत्र कामी हैं | कामी इन्द्रियों के द्वारा विषय जाना जाता है । उसको अनुभूति नहीं होती। भोगी इन्द्रियों के द्वारा अनुभति और ज्ञान दोनों होते हैं । इन्द्रियोंके द्वारा हम बाहरी वस्तुओंको जानते हैं। जाननेकी यह प्रक्रिया सबको एक-सी नहीं होती । चक्षुकी ज्ञानशक्ति शेष इन्द्रियोंसे अधिक पटु होती है। प्रोत्रकी शानशक्ति चक्षुसे कम है और शेष तीन इन्द्रियोंसे अधिक है । बाह्य-जगतकी जानकारी इन्द्रियोंके माध्यमसे होती है और इस जानकारीका संवर्धन मनसे होता है। प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषयको क्षयोपशमरूप योग्यता द्वारा जानती है और इन्द्रिय द्वारा प्राप्त ज्ञानका विस्तार मन द्वारा होता है । इन्द्रियां स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्दको ग्रहण करती हैं। उनके ग्रहण करनेको शक्ति निम्नलिखित तथ्योंपर आधारित है :
(१) निर्वृत्ति-द्रव्य-इन्द्रिय, पौद्गलिक रचना । (२) उपकरण-शरीराधिष्ठान इन्द्रिय 1 (३) लब्धि-भाव-इन्द्रिय । (४) उपयोग-आत्माधिष्ठान ।
जिससे ज्ञान और दर्शनका लाभ हो सके या जिससे आत्माके अस्तित्वकी सूचना प्राप्त हो जैसे इन्द्रिय कहते हैं। इन इन्द्रियोंके द्रव्य और भावरूपसे दोदो भेद हैं । इन्द्रियाकार पुद्गल और आत्म-प्रदेशोंकी रचना द्रव्येन्द्रिय है और क्षयोपशमविशेषसे होनेवाला आत्माका शानदर्शनरूप परिणाम भाव-इन्द्रिय है।
द्रव्य-इन्द्रियके दो भेद हैं-निर्वृत्ति और उपकरण । निर्वृत्तिका अर्थ रचना है अर्थात् इन्द्रियाकार रचना होना निर्वृत्ति है । यह बाह्य एवं आभ्यन्तरके भेदसे दो प्रकारको है । बाह्य निर्वृत्तिसे इन्द्रियाकार पुद्गल रचना और आभ्यन्तर निर्वृत्तिसे इन्द्रियाकार आत्म-प्रदेश ग्रहण किये जाते हैं। यद्यपि प्रतिनियत इन्द्रिय४१४ : तीर्थकर महावीर और उनको आचार्य-परम्परा