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नगण्य और श्रीहीन थे । संयमको साधनाने उनकी आत्मामें अपूर्व सेब उत्पन्न कर दिया था।
भुनिराजको चींटियोके उपसर्गसे आक्रान्त देखकर चेलनाकी आंखें सजल हो उठी। उसने अपने हाथोंसे यमधरके शरीरपर बढ़ी हुई चोटियोंको हटाया और उनके शरोरपर चन्दनका लेप किया। उपसर्गके दूर होते ही मुनिने आंखें खोल दी। बिम्बसार अपनी राजमहिषी चेलनाके सामने खड़े थे। मुनिने एक साथ दोनोंको धर्मवृद्धिका आशीर्वाद दिया; अतः उनकी दृटिसे उपकार और अपार मारलेवारगेई कार नहीं था।
मुनिराजके इस व्यवहारसे बिम्बसार बहुत प्रभावित हुए। उनके हृदयकी ग्रन्थि खुल गयी । हृदय परिवत्तित हो गया। प्रतिहिंसाकी अग्नि शान्त हो गयी और अजित मिथ्यात्व विगलित होने लगा। भात्म-कल्याणका दुवर्षे माग दृष्टिगोचर होने लगा । जीवनका मंगलघट आत्मसौरभसे भरने लगा। बिम्बसारको आज ऐसा अनुभव हआ-मानो उसका नया जन्म हआ हो। उनका अभानतम ढल चुका था और सच्चे ज्ञानकी किरणें फूट रही थीं। उनके जीवनके इतिहासमें यह घड़ी सदा अविस्मरणीय रहेगी।
मंगल-प्रभातका दर्शन होते ही बिम्बसारकी आत्मा मृदुल हो गयी और उसमें उपदेश ग्रहण करनेका पात्रत्व विकसित हो गया। यमघर मुनि कहने लगे"वत्स! यह संसार नाशवान है, शरीर क्षणस्थायी है, आत्मा अजर-अमर है। जो यनन्त चैतन्यको प्रबुद्ध करनेकी साधना करता है, उसीका मानव-शरीर प्राप्त करना सार्थक है । जीवनमें कुछ ऐसे प्रसंग आते हैं, जो जीवनको धाराको मोड़ देते हैं । अतएव अब तुम तोश्रीकर महावीरके समवशरणमें जाओ । वह समवशरण विपुलाचलपर स्थित है।"
महावीरके दर्शन-मात्रसे बिम्बसारका जीवन कृतार्थ हो गया । वह महावीरके उपदेशोंका प्रमुख श्रोता था। उसने साठ हजार जोवन और जगत्सम्बन्धी प्रश्न पूछे, जिनका महावीरने उत्तर देकर श्रोणिकको सन्तुष्ट किया । इतिहासकारोंको दृष्टिमें श्रेणिक ___इतिहासकारोंने श्रेणिकका उल्लेख बिम्बसारके नामसे किया है। बौद्धग्रन्थोंमें भी श्रेणिकका विस्तृत जीवन-परिचय प्राप्त होता है। बताया गया कि २२ वर्षको अवस्थासे ५२ वर्ष तक श्रेणिकने राज्य-शासन किया था। गिलगिटसे प्राप्त मैन्युस्क्रिप्टमें श्रेणिकका उल्लेख है ।' बौद्धसाहित्यमें थेणिक
१. वीपवंश ३-५६-१०
तीर्षकर महावीर और उनकी देशना : २०९