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________________ 1 से परिपूर्ण था। कोटके प्रान्त भागोंमें लगी हुईं अरुणमणियाँ, पन्नाओंकी प्रभा छायामय पटलोंसे परिपूर्ण होने के कारण संध्याकालीन श्रीका सृजन करती थीं। भूमिपर जटित इन्द्रनीलमणियाँ अपनी आमासे भ्रमरोंकी भ्रांति उत्पन्न करती थीं । उन्नत भवन और रत्नजटित गोपुर अपने सौन्दर्यसे पथिकों के मनको आकृष्ट करते थे । मुक्ताओंकी आभाके कारण इस नगर में श्वेत किरणोंका वितान तना रहता था। धन-धान्य, पशु सम्पत्ति आदिले युक्त यह नगर प्रजा'जनों को अत्यंत सुखप्रद था' | आचार्य जिनसेन प्रथमने भी विदेहदेशके अन्तर्गत कुण्डपुरका यथार्थ चित्रण किया है। उन्होंने लिखा है कि यह ऐसा सुन्दर नगर है जो इन्द्रके नेत्रोंकी पंक्तिरूप कमलिनियों के समूह से सुशोभित है तथा सुखरूपी जलका कुण्ड है । यहाँ शंखके समान श्वेत एवं शरद् ऋतुके मेघके समान उन्नत भवनों के समूह से श्वेत हुआ आकाश अत्यन्त सुशोभित होता है । भवनोके अग्रभागमें लगी हुई चन्द्रकान्तमणिकी शिलाएं रात्रिके समय चन्द्रमारूपी पतिके करस्पर्श से स्वेदयुक्त स्त्रियोंके समान द्रवीभूत हो जाती हैं । भवनोंके अग्रभाग में जटित सूर्यकान्तमणियाँ अत्यन्त देदीप्यमान है। भवनों के शिखरपर जटित पद्मरागमणियों सूर्य की किरणोंके संसर्गसे अत्यन्त अनुरक्त अङ्गनाकी तरह दिखलायी पड़ती हैं। इस नगर में कहीं मोतियोंकी मालाएं लटक रही हैं, कहीं मरकतमणिका प्रकाश व्याप्त हो रहा है, कहीं हीरकप्रभा फैल रही है, तो कहीं बंडूर्यमणियोंको नौली - नीली आभा छिटक रही है । यह नगरी कोटरूपी पर्वतोंके बड़ेबड़े धूलि कुट्टिम और परिखासे वेष्टित है । इस नगरीका अतिक्रमण करनेमें १. तत्रास्त्ययो निखिल वस्त्वव गायुक्तं भास्वत्कलाधर बुध: सबुषं सत्तारं अध्यासितं वियदिव स्वसमानशोभं ख्यातं पुरं जगति कुंडपुराभिधानं !! प्राकारको टिघटितारुणरत्नभास छायामयैः परिगता पटलैः समंतात् । आभाति वारिपरिखा नितरामनेका संध्यामियं विदधतीय दिवापि यत्र ॥ धौतेंन्द्रनीलमणि कल्पित कुट्टिमेषु योपहाररचितान्यसितोत्पलानि । एकीकृतान्यपि सलीलतया प्रयति व्यक्ति पतद्भ्रमर हुंकृतिभिः समंतात् ॥ जैत्रेयवः सुमनसो मकरध्वजस्य निस्तेजितां बुजरुषो शशलक्ष्मभासः | अप्रावृषोः नवपयोधर कांतियुक्ता यस्मिन्विभान्त्य सरितः सरसा रमप्यः ॥ अत्युन्नताः शशिकरप्रकरावदाता मूर्धस्वरत्नहमिपल्लवितांत रिक्षाः । उत्संगदेशसुनिविष्टमनोज्ञरामाः पौरा विभाति सुधि यत्र सुधालयाश्च ।। लीलामहोत्पलमपास्य कराग्रसंस्थं कर्णोत्पलन विगलम्मनु यत्र लूंगाः । निश्वाससौरभरता वदने पतन्ति स्त्रीणां मृदुमृदुकराहतिमीप्सवश्च ॥ - महाकवि अलग विरचित वर्षमानचरित, सर्ग १७, पद्म ७-१२. तीर्थंकर महावीर और उनकी देशना ८३
SR No.090507
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages654
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size14 MB
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