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________________ ८० ३१० विषय गाथा पृ० सं० । विषय गाथा/पृ० सं० १६ अवधिज्ञान के क्षेत्र का प्रमाण बन्धयोग्य परिणाम २०१-२०४ । ३२२ (गा० १७८-१८३) देब दुर्गतियों में उत्पत्ति के कारण २०५ । ३२३ ऊर्ध्व दिशा में उत्कृष्ट रूप से अवधि कन्दर्प देवों में उत्पत्ति के कारण २०६ । ३२३ क्षेत्र का प्रमाण १७८ । ३१७ वाहन देवों में उत्पत्ति के कारण २०७ । ३२३ अधः एवं तिर्यग्क्षेत्र में अवधिज्ञान किल्विषक देवों में उत्पत्ति के का प्रमाण १७९ । ३१७ कारण २०८ । ३२४ क्षेत्र एवं कालापेक्षा जघन्य अवधि सम्मोह देबों में उत्पत्ति के कारण २०६ । ३२४ ज्ञान असुरों में उत्पन्न होने के कारण २१० । ३२४ असुरकुमार देवों के अवधिज्ञान १८१ । ३१८ उत्पत्ति एवं पर्याप्ति वर्णन का प्रमाण २११ । ३२४ शेष देवों के अवधिज्ञान सप्तादि धातुओं व रोगादि का का प्रमाण १८२ । ३१६ निषेध २१२-१३ । ३२५ प्रवधिक्षेत्र प्रमाण विक्रिया १८३ । ३१८ भवनवासियों में उत्पत्ति २०. भवनवासी देवों में गुणस्थानाविक का __ समारोह धर्णन (गा० १८४-१६६) विभंगज्ञान उत्पत्ति २१७ । ३२६ अपर्याप्त ब पर्याप्त दशा में नवजात देवकृत पदचात्ताप २१८-२२२ । ३२६ गुणस्थान १८४-८५ । ३१६ सम्यक्त्वग्रहण २२३ । ३२७ उपरितन गुणस्थानों की विशुद्धि अन्य देवों को सन्तोष २२४ । ३२७ विनाश के फल से भवनवासियों जिनपूजा का उद्योग २२५-२७ । ३२७ में उत्पत्ति १८६-८७ । ३१६ जिनाभिक एवं पूजन आदि २२८-३८ । ३२८ जीव समास पर्याप्ति १८८ । ३२० पूजन के बाद नाटक २२६ 1 ३३० प्राण १८४ । ३२० सम्बरष्टि एवं मिथ्यादृष्टि देव के संज्ञा, गति, योग, वेद. कषाय, ज्ञान, पूजनपरिणाम और अंतर २४०-४१ । ३३० दशन, लेश्या, भव्यत्व, उपयोग १६०-६६ । ३२०-२१ जिनपूजा के पश्चात् २४२ । ३३१ २१. एक समय में उत्पत्ति एवं मरण का प्रमाण भवनवासी देवों के (गा. १९७) ३२१ सुखानुभव २४३-२५० । ३३६-३३३ २२. मवनवासियों को प्रागति निर्देश २४, सम्यक्त्व ग्रहण के कारण (गा. २५१-२५२) (गा. १९८-२००) ३२२ भवनवासियों में उत्पत्ति के २३. भवनबासी देषों को प्राधु के बन्ध योग्य कारण २५३-५४ । ३३४ परिणाम (गा. २०१-२५०) महाधिकारान्त मंगलाचरण २५५ । ३३५
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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