SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 410
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [ ३३३ गाथा : २५०-२५२ ] तदिनो महाहियारो दीयेसु गिदेसु भोग-खिदोए वि गंदण-वणेसु। वर-पोक्खरिणी-पुलिणत्यलेसु कोडंति राएण ॥२५०॥ ॥ एवं 'सुहप्परूवणा समत्ता । अर्थ :-( वे कुमार देव ) रागसे-द्वीप, कुलाचल, भोगभूमि, नन्दनवन एवं उत्तम बावड़ी अथवा नदियोंके तट स्थानों में भी क्रीड़ा करते हैं ॥२५०।। इस प्रकार देवोंको सुख-प्ररूपणाका कथन समाप्त हुआ । सम्यक्त्वग्रहणके कारण भवरणेसु समुप्पण्णा पत्ति पाविदूरग छन्भेयं । जिण-महिम-वंसणेणं केई 'देविद्धि-दसणदो ॥२५१।। जादीए सुमरणेणं घर-धम्मप्पबोहणावलद्धीए। गेण्हते सम्मत्तं दुरंत-संसार-णासयरं ॥२५२।। ॥ सम्मत्त-महणं गदं ।। अर्थ :-भवनोंमें उत्पन्न होकर छह प्रकारको पर्याप्तियोंको प्राप्त करने के पश्चात् कोई जिन-महिमा ( पंचकल्याणकादि ) के दर्शनसे, कोई देवोंकी ऋद्धिके देखनेसे, कोई जातिस्मरणसे और कितने ही देव उत्तम धर्मोपदेशकी प्राप्तिसे दुरन्त संसारको नष्ट करनेवाले सम्यग्दर्शनको ग्रहण करते हैं ॥२५१-२५२॥ ॥ सम्यक्त्यका ग्रहण समाप्त हुभा ॥ १. द. ब. क. ज. उ. सस्वप्पं । २. द. ब. के. ज. ठ. देविंद।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy