SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 375
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ९६८ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १०६-११२ जिण-विट्ठ-पमाणाओ' होति पइण्णय-तियस्स देवीयो। सव्व-णि गिट्ठ-सुराणं, पियाओ बत्तीस पत्त षकं ॥१०॥ । ३२ । अर्थ :-प्रकीर्णक, प्राभियोग्य और किल्बिषिक, इन तीन देवोंकी देवियाँ जिनेन्द्रदेव द्वारा कहे गये प्रमाण स्वरूप होती हैं । सम्पूर्ण निकृष्ट देवोंके भी प्रत्येकके बत्तीस-बत्तीस प्रिया ( देवियाँ) होती हैं ।।१०६॥ अप्रधान परिवार देबोंका प्रमाण एदै सव्वे देवा देविदाणं पहाण-परिवारा। अण्णे वि अप्पहाणा संखातीदा विराजति ॥११०॥ प्रर्थ :- ये सब उपर्युक्त देव इन्द्रोंके प्रधान परिवार स्वरूप होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य और भी असंख्यात अप्रधान परिवार सुशोभित होते हैं ।।११०॥ भवनबासी देवोंका आहार और उसका काल प्रमाण इद-पडिद-प्पहुदी तह वीओ मरण पाहारं । अमयमय-मइसिद्धि संगेण्हते णिरुवमारणं ॥१११॥ अर्थ : इन्द्र-प्रतीन्द्रादिक तथा इनकी देवियाँ अति-स्निग्ध और अनुपम अमृतमय पाहारको मनसे ग्रहण करती हैं ॥१११।। 'चमर-दुगे आहारो परिस-सहस्सेण होइ णियमेण । पणुवीस-दिणाण दलं भूदाणंदादि-छह पि ॥११२॥ व १००० । दि २५ । अर्थ :-चमरेन्द्र और वैरोचन इन दो इन्द्रोंके एक हजार वर्ष बीतनेपर नियमसे पाहार होता है । इसके प्रागे भूतानन्दादिक छह इन्द्रोंके पच्चीस दिनोंके आधे ( १२३ ) दिनोंमें आहार होता है ।।११२॥ २. द. ब. णिवरुवमणं । क. णिवरुषमारण । ३. द. ज. ठ. १.द. पमाणाप्रो, ज.ठ, पमाणिक । ४. द.ज.द. बरस । चरमदुगे।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy