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________________ २८८] तिलोत्त [ गाथा : ८२-८५ अर्थ :- चमरेन्द्रके इक्यासी लाख, प्रट्ठाईस हजार महिष सेना तथा पृथक्-पृथक् हो होते है तुरगादिक भी तिट्ठाणे सुष्णाणि छष्णव- श्रउ छ्क्क पंच-अंक- कमे सत्ताणीया मिलिदा णादव्वा खमर-इ दहि ॥ ८२ ॥ ५६८९६००० । अर्थ :- तीन स्थानों में शून्य, छह, नौ, आठ, छह और पाँच अंक स्वरूप क्रमशः चमरेन्द्रकी सातों श्रनीकों का सम्मिलित प्रमाण जानना चाहिए ||२|| विशेषार्थ :- गाथा ८० के विशेषार्थ में प्राप्त हुए गुणसंकलित धनको ७ से गुणित करने पर ( ८१२८००० x ७ = ) पाँच करोड़, अड़सठ लाख, छ्यानबे हजार ( ४६८९६०००) सातों कोंका सम्मिलित धन प्राप्त हो जाता है । यह अमरेन्द्रको अनीकों का सम्मिलित धन है । छाहचरि लक्खाणि वीस-सहस्साणि होंति महिसाणं । वयामि इंदे पुह पुह तुरयादिणो वि तम्मेत्ता ॥ ८३ ॥ ७६२००००। अर्थः – वैरोचन इन्द्रके छिहत्तर लाख बीस हजार महिष और पृथक्-पृथक् तुरगादिक भी इतने ही हैं ||३|| चउ-ठाणेसु सुण्णा चउ तिय तिय पंच-अंक माणाए । वइरोपणस्स मिलिदा सत्ताणीया इमे होंति ॥ ८४ ॥ । ५३३४०००० अर्थ :- चार स्थानों में शून्य, चार, तीन तीन और पांच, इन अंकोंके क्रमशः मिलानेपर जो संख्या हो, इतने मात्र वैरोचन इन्द्रके मिलकर ये सात श्रनीकें होती है ॥ ८४ ॥ एक्कत्तरि लक्खाणि णावाम्रो होति बारस सहस्ता । भूदारणंबे पुह पुह 'तुरग - "पहूदीणि तम्मेा ॥ ८५ ॥ ७११२००० १ ब. उरग ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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