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________________ २८४ ] तिलोयपम्पत्ती [ गाथा : ७४-७६ अर्थ :--चमरेन्द्र के तनुरक्षक देव दो लाख, छप्पन हजार और द्वितीय (वैरोचन ) इन्द्रके दो लाख, चालीस हजार होते हैं । तृतीय ( भूतानन्द ) इन्द्रके तनुरक्षक दो लाख, चौबीस हजार तथा शेषमेंसे प्रत्येकके दो-दो लाख प्रमाण तनुरक्षक देव जानने चाहिए ।।७२-७३।। प्रवीसं छव्वीसं छच्च सहस्साणि चमर-तिदयम्मि । आदिम-परिसाए' सुरा सेसे पसेक्क-चउ-सहस्साणि ॥७॥ २८००० । २६००० । ६००० । सेसे १७ । ४००० । प्रर्य :-चमरादिक तीन इन्द्रोंके आदिम पारिषद देव क्रमशः अट्ठाईस हजार, छब्बीस हजार और छह हजार प्रमाण तथा शेष . इन्द्रोंमेंसे प्रत्येकके चार-चार हजार प्रमाण होते हैं ।।७४।। तीसं अट्ठावीसं अट्ठ सहस्साणि चमर-तिदयम्मि । मज्झिम-परिसाए सुरा सेसेसु छस्सहस्साणि ॥७॥ ३०००० । २८००० । ८००० । सेसे १७ । ६००० । अर्थ :-चमरादिक तीन इन्द्रोंके मध्यम पारिषद देव श्रमशः तीस हजार, अट्ठाईस हजार और साठ हजार तथा शेष इन्द्रों से प्रत्येकके छह-छह हजार प्रमाण होते हैं ।।७।। बत्तीसं तीसं दस होति सहस्साणि चमर-तिदयम्मि । बाहिर परिसाए सुरा अट्ट सहस्साणि सेसेसु ॥७६।। ३२००० । ३०००० । १०.००० । सेसे १७ । ८००० । अर्थ :-- चमरादिक तीन इन्द्रोंके क्रमशः बत्तीस हजार, तीस हजार और दस हजार तथा शेष इन्द्रों में से प्रत्येकके पाठ-पाठ हजार प्रमाण बाह्य पारिषद देव होते हैं ॥७६॥ [भवनवासी-इन्द्रोंके परिवार-देवोंकी संख्याकी तालिका अगले पृष्ठ पर देखिये] - -... १. क.ज. परिसारण ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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