SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 357
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २८० । तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : ५३-५६ अर्थ :-आदि-अन्तसे रहित (अनादिनिधन ) वे जिनभवन, भवनवासी देवोंके भवनोंको संख्या प्रमाण सात करोड, बहत्तर लाख, सुशोभित होते हैं ॥५२॥ ७७२००००० जिनभवन हैं। भवनबासी-देव, जिनेन्द्रको ही पूजते हैं सम्मत्त-रयण-जुत्ता णिन्भर-भत्तीए णिच्चमच्चंति । कम्मक्खवण-णिमित्तं देवा जिणणाह-पडिमानो ॥५३॥ कुलदेवा इदि मण्णिय अण्णेहि बोहिया बहुपयारं । मिच्छाइट्ठी णिच्चं पूर्जति जिणिद-पडिमानो ॥५४।। ॥ जिणभवणा गदा ।।१३।। अर्थ :-सम्यग्दर्शनरूपी रत्नसे युक्त देव तो कर्मक्षयके निमित्त नित्य ही अत्यधिक भक्तिसे जिनेन्द्र-प्रतिमानोंकी पूजा करते हैं, किन्तु सम्यग्दृष्टि देवोंसे सम्बोधित किये गये मिथ्यादृष्टि देव भी कुलदेवता मानकर जिनेन्द्र-प्रतिमाओंकी नित्य ही नाना प्रकारसे पूजा करते हैं ! ५३-५४|| ॥ जिनभवनोंका वर्णन समाप्त हुमा ।।१३।। कूटोंके चारों पोर स्थित भवनवासी-देवोंके प्रासादोंका निरूपण कुडाण 'समंतादो पासादा होंति भवण-देवाणं । 'णाणाविह-विण्णासा वर-कंचण -रयण-णियरमया ॥५५॥ अर्थ :-कूटोंके चारों ओर नानाप्रकारकी रचनापोंसे युक्त और उत्तम स्वर्ण एवं रत्नसमूहसे निर्मित भवनवासी देवोंके प्रासाद हैं ॥५५।। सत्तट्ठ-णव-बसादिय-विचित्त-भूमीहि भूसिवा सन्थे । लंबंत-रयण-माला विप्पंत-मणिप्पवीव-कंठिल्ला ॥५६।। १. द. ब, क. ज. समत्तादो। २. द. ब. पासायो। ३, द, ब. क. ज. ठ. पाणा विविविणासं । ४. ब. कंचणरिणयर ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy