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________________ २७२ ] तिलोय पण्णत्ती निवास स्थानोंके भेद एवं स्वरूप सुराण होदि तिविहा गं । भरणा शनण-पुराण रयण पहाए भवणा बीब-समुद्दाण उबरि भवणपुरा ||२२|| दह- सेल - कुमादी रम्माणं उवरि होंति श्रावासा जागादीण केसि तिय- खिलया भवामेवकमसुराणं ॥२३॥ [ गाथा : २२-२४ || भवरण - वण्णरणा समता ||८|| अर्थ :- भवनवासी देवोंके निवास स्थान भवन, भवनपुर और प्रावासके भेदसे तीन प्रकार के होते हैं । इनमेंसे रत्नप्रभा पृथिवीमें भवन, द्वीप समुद्रोंके ऊपर भवनपुर एवं रमणीय तालाब, पर्वत तथा वृक्षादिकके ऊपर आवास हैं । नागकुमारादिकोंमेंसे किन्हीं के भवन, भवनपुर एवं श्रावास - रूप तीनों निवास हैं परन्तु असुरकुमारोंके केवल एक भवनरूप ही निवास स्थान होते हैं ।।२२-२३ ।। 11 का वर्णन समाप्त हुआ ||८|| पद्धिक, महद्धक र मध्यम ऋद्धिधारक देवोंके भवनों के स्थान प्रष्प-महद्धिय-मज्झिम-भावण देवाण होंति भवणाणि । दुग- बादाल- सहस्सा लक्खमधोधो खिदीए गंतूणं ॥ २४ ॥ । २००० | ४२००० | १००००० । || अप्पमहद्धिय-मज्झिम भावण देवाण रिणवास-खेत्तं समत्तं ॥९॥ अर्थ : अपद्धिक, महद्धिक एवं मध्यम ऋद्धिके धारक भवनवासी देवोंके भवन क्रमशः चित्रा पृथिवीके नीचे-नीचे दो हजार, बयालीस हजार और एक लाख योजन- पर्यन्त जाकर हैं ||२४|| विशेषार्थ :- चित्रा पृथिवी से २००० योजन नीचे जाकर अल्पऋद्धि धारक देवोंके ४२००० योजन नीचे जाकर महाऋद्धि धारक देवोंके और १००००० योजन नीचे जाकर मध्यम ऋद्धि धारक भवनवासी देवोंके भवन हैं । इसप्रकार प्रपद्धिक, महर्दिक एवं मध्यम ऋद्धिके धारक भवनवासी देवोंका निवास क्षेत्र समाप्त हुआ ।। 8 ।। १. द. भुवरण ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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