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________________ २३६ ] तिलोयपणाती [ गाथा : २६७-२७० छठी पृथिवीमें पटलक्रमसे नारकियोंके शरीरका उत्सेध छासट्ठी-हिय-सयं कोदंडा दोषिण होंति हत्था य । सोलस पव्वा य पुढं हिम-पडल-गदाण उच्छेहो ॥२६७।। दं १६६, ह २, अं १६ । अर्थ :-(छठी पृथिवीके) हिम पटलगत जीवोंके शरीरकी ऊँचाई एकसौ छयासठ धनुष, दो हाथ और सोलह अंगुल प्रमाण है ।।२६७॥ दोण्णि सयाणि अट्ठाउत्तर-दंडाणि अंगुलाणि च । बत्तीसं 'छट्ठीए 'बद्दल-ठिद-जीव-उच्छेहो ॥२६॥ २०८, नं ३२ । अर्थ : छठी पृथिवीके वर्दल पटलमें स्थित जीवोंके शरीरका उत्सेध दोसी माठ धनुष और बत्तीस ( १ हाथ 4) अंगुल प्रमाण है ॥२६॥ पण्णासन्भहियाणि दोण्णि सयाणि सरासणाणि च । लल्लंक-णाम-इंदय-ठिवाण जीवाण उच्छहो ॥२६॥ अर्थ : लल्लंक नामक इन्द्रकमें स्थित जीवोंके शरीरका उस्सेध दोसौ पचास धनुष-प्रमाण है ॥२६॥ सातवीं पृथिवीके नारकियोंके शरीरका उत्सेघ पुढमीए सत्तमिए अवधिछाम्हि एस्क पडलम्हि । पंच-सयाणि दंडा णारय-जीवाण उस्सेहो ॥२७॥ ६५००1 - --- १. द. छट्ठाए। २ . क. ठ बंदला द्विदल-जोय ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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