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________________ गाथा : २१२-२१४ ] विदुओ महाहियारो [ २१६ चौथी पृथिवीमें नारकियोंकी प्रायुका प्रमाण बावण्णुवही-उवमा पभो तिय-वढिदा य पत्तेक्कं । सत्तरि-परियंतं ते सत्त-हिदा तुरिम-पुढवि-जेट्ठाऊ ॥२१२॥ ५२ ५५ ५८ । ६१ ६४ | ६७/ ७ ७ ७ ७ ७ | ७ ७ अर्थ :-चौथी पृथिवीमें सातसे भाजित बाबन सागरोपम प्रभव है। इसके प्रागे प्रत्येक पटलमें सत्तर पर्यन्त सातसे—भाजित तीन (3) की वृद्धि करने पर उत्कृष्टायुका प्रमाण निकलता है ॥२११॥ पारमें 3; मारमें ५५; तारमें ; चर्चा में ; तमकमें वादमें : खड़खड़में या १० सागरोपम उत्कृष्ट प्रायु है ।।२१२।। । पांचवीं पृथिवीमें नारकियोंकी आयुका प्रमाण सगवण्णोवहि-उवमा प्रावो ससाहिया य पत्ते वकं । परणसीदी-परिअंतं पंच-हिदा पंचमोन जेट्ठाऊ ॥२१३॥ ५७/६४१७१७८| | अर्थ :-पांचवीं पृथिवीमें पाँचसे भाजित सत्तावन सागरोपम प्रादि है। अनन्तर प्रत्येक पटलमें पचासी तक पांचसे भाजित सात-सात (३) के जोड़नेपर उत्कृष्ट प्रायुका प्रमाण जाना जाता है ।।२१३१॥ तममें सागरोपम; भ्रममें -४; झसमें :-; अन्धमें और तिमिस्र इन्द्रककी उत्कृष्टायु अर्थात् १७ सागर प्रमाण है ! छठी पृथिवीमें नारकियोंकी पायुका प्रमाण छप्पण्णा इगिसट्ठी 'छासट्ठी होंति उवहि-उवमारणा । तिय-भजिदा मघवीए णारय-जीवाण जेट्ठाऊ ॥२१४॥ १. क. ब. वासट्ठी।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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