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________________ २१४ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १६६-१६६ घम्माए णारइया संखातीताप्रो होंति सेढीयो । एवाणं गुणगारा बिवंगुल-बिदिय-मूल-किंचूणं ॥१६॥ अर्थ :- धर्मा पृथिवीमें नारकी जीव असंख्यात आयुके धारक होते हैं। इनकी संख्या निकालनेके लिए गुणकार घनांगुलके द्वितीय वर्गमूलसे कुछ कम है । अर्थात् इस गुणकारसे जगच्छेगीको गुणा करनेपर जो राशि उत्पन्न हो उतने नारकी जीव धर्मा पृथिवीमें विद्यमान हैं ।।१९६॥ श्रेणी x धनांगुलके दूसरे वर्गमूलसे कुछ कम धर्मा पृ० के नारकी। शंसाए मारहरा मेलीय प्रसंशभाग मेता वि। सो रासी सेढोए बारस-मूलावहिद सेढी ॥१९॥ अर्थ :-वंशा पृथिवीमें नारकी जीव जगच्छ्रणीके असंख्यातभाग मात्र हैं, वह राशि भी जगच्छ्रेणीके बारहवें वर्गमूलसे भाजित जगच्ऋणी मात्र है 11१९७।। श्रेणी श्रेणीका बारहवां वर्गमूल = वंशा पृथिवीके नारकियोंका प्रमाण । मेधाए णारइया सेढीए असंखभाग-मेत्ता वि । सेढीए 'दसम-मूलेण भाजिदो होदि सो सेढी ॥१६॥ अर्थ : मेघा पृथिवीमें भारको जीव जगच्छणीके असंख्यातभाग प्रमाण होते हुए भी जगन्छ रणीके दसवें वर्गमूलसे भाजित जगच्छणी प्रमाण है ।।१९८।। श्रेणी श्रेणीका दसवाँ वर्गमूल = मेधा पृ० के नारकियोंका प्रमाण । तुरिमाए णारइया सेढीए असंखभाग-मेत्ते वि । सो सेढोए अट्ठम-मूलेणं अवहिदा सेढी ॥१६॥ १. द. क. ठ. दसमलेग ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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