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________________ १९६ ] तिलोयपत्ती [ गाथा : १५८ इन्द्रक बिलोंका बाहल्य श्रेणीबद्धोंका बाहल्य प्रकीर्णकों का बाहल्य पहली पृ०.१ + १ = २,२४३-६,६६=१ कोस २४४=८,८:६ = १ कोस२४७=१४, १४ |-६-२, कोस दूसरी पृ०-२+१-३,३४३ - ६,६-:-६=१६, ३४४=१२,१२:६-२, ३४७-२१, २२ ६-३६कोस तीसरीपृ०-३+१= ४,४४३-१२,१२:६= २.४४४=१६,१६.६=२ ४x७=२८, २९ +६=४३ कोस चौथी पृ०.-४+१-५,५४ ३ ८ १५,१५, ६-२३,५४४=२०,२०२६-३ ५.४७=३५, ३५ :६- कोस पाँचवीं,,-५+१= ६,६४३ = १८,१८:६-३, ६x४=२४,२४ : ६-४,६४७-४२, ४२ । ६ = ७ कोस | छछी पृ०-६ +१-७,७४३=२१,२१+६=३६, ७४४ =२८,२१:६= ४३,७४७ = ४६, ४६/ :.६= कोस! सातवीं प०-७+१=८,८४३-२४,२४:६४८४४-३२,३२, ६-५, प्रकीर्णकों का । अभाव है। अहवा प्रादी छ अट्ट चोद्दस तद्दल-वढिय जाब सत्त-खिदी। कोसच्छ-हिवे इंदय-सेढी-पइण्णयाण बहलत्तं ॥१५॥ इ० १ । ३ । २।५ । ३ ३ ३ । ४ । सेढी ।। २ । । । ४ । ३ । । प्र०।11। । ७ । १९ । मर्थ : अथवा–यहाँ प्रादिका प्रमाण क्रमशः छह, पाठ और चौदह है। इसमें दूसरी पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी पर्यन्त उत्तरोत्तर इसी आदिके अर्ध भागको जोड़कर प्राप्त संख्यामें छह कोस का भाग देनेपर क्रमश: विवक्षित पृथिवीके इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलोंका बाहल्य निकल आता है ।।१५।। विशेषार्थ :-पहली पृथिवी के आदि (मुख) इन्द्रक बिलोंका बाहल्य प्राप्त करनेके लिए ६, श्रेणीबद्ध बिलोंके लिए ८ और प्रकीर्णक बिलोंका बाहल्य प्राप्त करने हेतु १४ है। इसमें दूसरी पृथिवीसे सातवीं पृथिवी पर्यन्त उत्तरोत्तर इसी प्रादि (मुख) के अर्ध-भागको जोड़कर जो लब्ध प्राप्त हो उसमें ६ का भाग देनेपर क्रमशः इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलोंका बाहल्य प्राप्त हो जाता है । यथा
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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