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________________ तिलोयपत्ती [ गाथा : १४०-१४२ विशेषार्थं : --- १७५००००-६१६६६६ - १६५८३३३ योजन विस्तार संज्वलित नामक to इन्द्रक बिलका है । १८८] पण्णा रस - लक्खापि छस्सट्टि - सहस्स छ सय छासड्डी | दोणि कला 'तदियाए संपज्ञ्जलिदस्स वित्थारो ॥ १४० ॥ १५६६६६६३ । अर्थ :- तीसरी - पृथिवी में संप्रज्वलित नामक नवें इन्द्रकका विस्तार पन्द्रह लाख, छ्यासठ हजार, छहसौ छयासठ योजन और एक योजन के तीन भागों में से दो भाग प्रमाण है ।। १४० ॥ c१६६६३ = १५६६६६६ योजन विस्तार संप्रज्वलित विशेषार्थ :- १६५८३३३३ नामक नवें इन्द्रक बिलका है । tet पृथिवी सात इन्द्रकोंका पृथक्-पृथक् विस्तार चोट्स जोयण - लक्खा पण-जुद सत्तरि सहस्स परिमाणा । तुरिमाए श्रारिदय व परिमाणं पुढवीए १४७५००० । अर्थ :- चौथी पृथिवीमें प्रार नामक प्रथम इन्द्ररूके विस्तारका प्रसारण चौदह लाख, पचहत्तर हजार योजन है || १४१ ॥ विशेषार्थ : --- १५६६६६६ प्रथम इन्द्रक-बिलका है । तेरस - जोय रण- लक्खा तेसीदि-सहस्स-ति-सय-तेत्तीसा | एक्क-कला तुरिमाए महिए मारिए दो ॥१४२॥ विशेषार्थ :- १४७५००० १३८३३३३३ | अर्थ : चौथी पृथिवी में मार नामक द्वितीय इन्द्रकका विस्तार तेरह लाख, तेरासी हजार, तीनस तैतीस योजन और एक योजनके तीसरे भाग प्रमाण है || १४२ ॥ ६१६६६३ - १३८३३३३३ योजन विस्तार मार नामक द्वितीय इन्द्रक बिलका हूँ । ॥ १४१ ॥ - ९१६६६ – १४७५००० योजन विस्तार श्रार नामक — १. द. ब. तदिए । क. ज. ठ. सदिए ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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