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________________ १.८६ ] तिलोयपात्ती [ गाथा : १३३-१३६ बावीसं लक्खारिण अद्व-सहस्सारिण ति-सय-तेत्तीसं । एक्क-कला ति-विहत्ता पुढवीए तसिद-वित्यारो ॥१३३॥ २२०८३३३ । प्रर्थ :-तीसरी पृथिवीमें असित नामक द्वितीय इन्द्रकका विस्तार बाईस लाख, पाठ हजार, तीनसौ तीस योजन और योजनका तीसरा भाग है ।।१३३।। विशेषार्थ :--२३००००० - ६१६६६३=२२०८३३३, योजन विस्तार असित नामक द्वितोय इन्द्रक बिलका है। सोल-सहस्सं छस्सय-छासट्टि एक्कबोस-लक्खाणि । पोलिय कला परियार सुदलीय ता-विशारो ॥१३४॥ पर्थ : -तीसरी पृथिवीमें तपन नामक तृतीय इन्द्रकका विस्तार इक्कीस लाख, सोलह हजार, छहसौ छयासठ योजन और योजनके तीन-भागोंमें से दो भाग प्रमाण है ।।१३४॥ विशेषार्थ :-२२०८३३३ - ६१६६६४२११६६६६० योजन विस्तार तपन नामक तृतीय इन्द्रक बिलका है। पणवीस-सहस्साधिय-विसदि-लक्खाणि जोयणाणि पि । तदियाए खोणीए तावण-णानस्स वित्थारो ॥१३॥ २०२५००० । अर्थ :-- तीसरी पृथिवी में तापन नामक चतुर्थ इन्द्रकका विस्तार बीस लाख, पच्चीस हजार योजन प्रमाण है ।।१३५।। विशेषार्थ :-२११६६६६३ - ६१६६६१=२०२५००० योजन विस्तार तापन नामक चतुर्थ इन्द्रक बिलका है। एक्कोणवीस-लक्खा तेत्तीस-सहस्स-ति-सय-तेत्तीसा । एक्क-कला तदियाए वसुहाए णिदाघ' वित्थारो ॥१३६॥ १६३३३३३३। १. द.ब. क. ज. ४. वणि होइ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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