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________________ गाथा : ११७-११६ ] विदुओ महाहियारो [ १८१ पर्थ :-तप्त नामक नवें इन्द्रकका विस्तार संतीस लाख, छयासठ हजार छहसौ छयासठ योजन और योजनके तीन-भागोंमेंसे दो भाग प्रमाण है ।।११६॥ विशेषार्थ :-३८५८३३३३ - ९१६६६३ - ३७६६६६६ योजन विस्तार तप्त नामक नवें इन्द्रक बिलका है। छत्तील जनदवाणि जोपणमा सहरि-सहस्सा । तसिदिदयस्य रुदं णादव्वं पढम-पुढथीए ।।११७॥ ३६७५०००। अर्थ :-पहली पृथिवीमें अमित नामक दसवें इन्द्रकका विस्तार छत्तीस लाख, पचहत्तर हजार योजन प्रमाण जानना चाहिए ।।११७।। विशेषार्थ :- ३७६६६६६ . - ६१६६६-३६७५००० योजन विस्तार त्रसित नामक दसवें इन्द्रक बिलका है। पणतीसं लक्खाणि तेसीदि-सहस्स-ति-सय-तेत्तीसा । एक्क-कला ति-विहत्ता रुंदं धक्कंत-णामम्मि ।।११८।। ३५८३३३३। अर्थ :-बत्रान्त नामक ग्यारहवें इन्द्रकका विस्तार पैंतीस लाख, तेरासी हजार, तीनसौ तेतीस योजन और एक योजनके तीन-भागोंमेंसे एक-भाग है ॥११८॥ विशेषार्थ : -३६७५००० -- ६१६६६३-३५८३३३३३ योजन विस्तार वक्रान्त नामक ग्यारहवें इन्द्रक बिल का है । चउतीसं लक्खाणि 'इगिणउदि-सहस्स-छ-सय-छासट्ठी। बोणि कला तिय-भजिदा एस अयरकंत-वित्थारो ॥११॥ ३४६१६६६। पर्थ :- प्रवक्रान्त नामक बारहवें इन्द्रकका विस्तार चौंतीस लाख, इक्यानबै हजार, छहसो छयासठ योजन और एक योजनके तीन-भागोंमेंसे दो-भाग प्रमाण है ।।११६|| १. द. इगरगउदि।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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