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________________ १६२ | श्रहवा तिलोय पणती समस्त पृथिवियोंका संकलित धन निकालने का विधान [ गाथा : ७१-७४ अधियस्य । अट्ठत्तालं दलिगं गुणिदं पहचनं । उणवण्णाए पहदं सव्ब-धणं होइ पुढवीणं ॥ ७१ ॥ अर्थ :- ग्रथवा अड़तालीसके आधेको आठसे गुणा करके उसमें पांच मिला देनेपर प्राप्त हुई राशिको उनचास से गुणा करें तो सातों पृथिवियोंका सर्वधन प्राप्त हो जाता है । विशेषार्थं : -x८ = १६२, १६२+५=१६७, १६७४६ = ६६५३ सर्व पृथिवियोंका संकलित धन 1 प्रकारान्तरसे संकलित धन निकालनेका विधान इंदय सेढीबद्धा णवय सहस्साणि इस्सयागं पि । तेवणं अधियाइ सव्वासु वि होंति खोणीसु ॥ ७२ ॥ । ६६५३ । अर्थ :---सम्पूर्ण पृथिवियों में कुल नौहजार छहसौ तिरेपन ( ६६५३ ) इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिल हैं ||७२ || समस्त पृथिवियोंके इन्द्रक और श्रीबद्ध बिलोंकी संख्या णिय णिय - चरिमिदय' - धण मेक्कोणं' होदि श्रादि- परिमाणं । नियणिय-पदरा गच्छा पचया सव्वत्थ द्वेष ॥७३॥ अर्थ :- प्रत्येक पृथिवीके श्रीधनको निकालने के लिए एक कम अपने-अपने चरम इन्द्रकका प्रमाण आदि, अपने - अपने पटलका प्रमाण गच्छ और चय सर्वत्र प्राठ ही है ||७३ || प्रथमादि पृथिवियोंके श्रीबद्ध बिलोंकी संख्या निकालने के लिए आदि गच्छ एवं चयका निर्देश बाणउदि जुत्त दुसया चउ-जुद दु-सया सयं च बत्तीसं । छावत्तरि छत्तीसं बारस रयणप्पहादि श्रादी ||७४ || १. क. चरमिद धय । २. क. मेक्कारणं । ३. ब. लई व द. ठ. लट्टेव । ४. क. चउ
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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