SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 235
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ तिलोय पण्णत्ती [ गाथा : ६३-६४ अर्थ : - दोसौ तेरानबं, दोसौ पाँच, एकसौ तेंतीस सतहत्तर सैंतीस और तेरह यह क्रमशः रत्नप्रभादिक छह पृथिवियों में प्रादिका प्रमाण है ||६२ || १५८ विशेषार्थ :- रत्नप्रभासे तमः प्रभा पर्यन्त छह पृथिवियोंके अन्तिम पटलकी दिशाविदिशाओं के श्रेणीबद्ध एवं इन्द्रक सहित क्रमशः २६३, २०५, १३३, ७७, ३७ और १३ बिल प्राप्त होते हैं, अपनी-अपनी पृथिवीका यही प्रादि या मुख या प्रभव है । गच्छ एवं चयका प्रभार तेरस एक्का रस - णव-सगपंच-तियाणि होंति गच्छाणि । सव्वत्थुत्तरमट्ठ' पराप्यह-पहुवि पुढवीसु १३ । ११ । ६ । ७ । ५ । ३ सम्वत्थुत्तरमट्ट अर्थ :- रत्नप्रभादिक पृथिवियोंमें क्रमश: तेरह, ग्यारह, नो, सात, पाँच और तीन गच्छ हैं । उत्तर या चय सब जगह आठ होते हैं || ६३ ॥ विशेषार्थ :- रत्नप्रभादि छह पृथिवियोंमें गच्छका प्रमाण क्रमशः १३, ११, ६, ७, ५ और ३ है तथा सर्वत्र उत्तर या चय में है । संकलित धन निकालने का विधान ॥६३॥ चय- हृदमिच्छूरा-पर्व रूणिच्छाए गुरिणद-चय- जुतं । दुगुणिद" - दरोण जुदं पद-बल-गुरिदं हवेदि संकलिदं ॥ ६४ ॥ चय - हवमिच्छूण पदं । ८ रूणिच्छाए गुरिपद चयं । ८ । जुदं ६६ । गुणिद वदरणादि सुगमं । अर्थ :- इच्छासे, हीन गच्छको चयसे गुरणा करके उसमें एक कम इच्छासे गुपित चयको जोड़कर प्राप्त हुए योगफल में दुगुने मुखको जोड़ देने के पश्चात् उसको गच्छके अर्धभागसे गुणा करनेपर संकलित धनका प्रमारण थाता है । ४. द. व मिक्कुरण पदं । रूणिच्छाए गुरिद चयं १. द. व. क. ठ सम्बद्युत्तरमंत । २. द. ब. क. रयणपढाए । ३. द. ब. सभ्य दुटुर । ५. ६. ब. क. ठ. गुणिदं वद । ६. द. ब. चयम्पदमित्थूण-पदं १३३८ । ८ । जुदं १ । दुगुणि देवादि सुगमं । इति पाठ: ७६ तम गाथायाः पश्चादुपलभ्यते ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy