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________________ १३८ 1 तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : २८६ अर्थ :-उपर्युक्त इन दोनों क्षेत्रों (वातावरुद्ध और पाठ भूमियों) के घनफलको मिलाकर उसे सम्पूर्ण लोकमेंसे घटा देने पर अवशिष्ट शुद्ध-अाकाशका प्रमाण प्राप्त होता है । उसकी स्थापना यह है-संदृष्टि मूलमें देखिये ( इस संदृष्टिका भाव समझमें नहीं पाया)। अधिकारान्त मङ्गलाचरण केवलणाण-तिणेत्तं चोत्तीसाबिसय-भूदि-संपण्णं । णाभेय-जिणं तिहुवण-णमंसणिज्जं णमंसामि ॥२६॥ एवमाइरिय-परंपरागय-तिलोयपण्णत्तीए सामण्ण-जगसरूव-रिणरूषण-पण्णत्ती णाम। पढमो महाहियारो सम्मत्तो ॥१॥ .. अर्थ :- केवलज्ञानरूपी तीसरे नेत्रके धारक, चौंतीस प्रतिशयरूपी विभूतिसे सम्पन्न और तीनों लोकोंके द्वारा नमस्करणीय, ऐसे नाभेय जिन अर्थात् ऋषभ जिनेन्द्रको मैं नमस्कार करता हूं ॥२८६॥ इसप्रकार प्राचार्य-परम्परागत त्रिलोक-प्रज्ञप्तिमें सामान्य जगत्स्वरूप निरूपण-प्रज्ञप्ति नामक प्रथम महाधिकार समाप्त हुआ ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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