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________________ गाथा : २८५ ] पढमो महाहियारो [ १२३ -- गवू . एदे' पुचिल्ल-पसस्तुरि पक्लित एमपीत-लाइ अतीवि-सहस्स-जोयणाहियतिण्हं कोडीरणं तेदालीस-तिसद-भाग-बाहल्लं जग-पदरं होदि । =३१६८०००० । मर्थ :-इस उपयुक्त घनफलके प्रमाणको पूर्वोक्त क्षेत्रके ऊपर रखनेपर तीन करोड़, उन्नीस लाख, अस्सी हजार योजनके तीनसौ तैतालीसवें-भाग बाहल्य प्रमाण जगत्प्रतर होता है। विशेषार्थ :-पूर्वोक्त योगफल ४१४५४१229 था। लोककी एक राजू ऊँचाईपर दोनों पार्श्वभागोंका धनफल १५३ : प्राप्त हुना । यहाँ दोनों जगह ४६ जगत्प्रतरके स्थानीय हैं, अत: योजन [ (५४००११ + ५१३१४ )=138300] ४४९ वर्ग राजू अर्थात् जगत्प्रतर x 180° घनफल प्राप्त हुआ 1 पाश्वभागाका पाश्र्वभागोंका धनफल पुणो सत्त-रज्जु-विक्खंभ-तेरह-रज्जु-प्रायाम-सोलह-बारह- [-सोलसबारह-] जोयरण-बाहल्लेण दोसु वि पासेसु ठिद-वाद-खत्त जग-पवर-पमारणेण कवे चउ-सट्टि-सदजोयणूण-अट्ठारह-सहस्स-जोयगाणं तेवालीस-तिसद-भाग-बाहल्लं जग-पदरमुप्पज्जदि । १७८३६ । ____ अर्य:-इसके अनन्तर सात राजू विष्कम्भ, तेरह राजू पायाम तथा सोलह, बारह ( सोलह एवं बारह ) योजन बाहल्यरूप अर्थात् सातवीं पृथिवीके पार्श्वभागमें सोलह, मध्यलोकके १. एदं पुचिल्लं । २. इ. सोलस ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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