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________________ २६] तिलोयपणती [ गाथा : २३६ मिरिकटक लोकका धनफल और उसकी प्राकृति एक्कस्सि गिरिगडरा विवफलं पंचतीस हिद लोगो । तं पणतीसप्पहिदं सेडि-घणं घरणफलं तम्हि ॥२३६॥ पर्य :--एक गिरिकटकका घनफल लोकके घनफलमें ३५ का भाग देनेपर ( = रूप में) प्राप्त होता है । जब इसमें ( में) ३५ का गुणा किया जाता है तब (सम्पूर्ण गिरिकटक लोकका) घनफल श्रेरिणघन ( = रूपमें ) प्राप्त हो जाता है ॥२३६॥ विशेषार्थ -३४३ घनराज प्रमाण वाले लोकका गिरिकटकको रचनाके माध्यमसे घमफल निकाला गया है । गिरि ( पर्वत ) नीचे चौड़े और ऊपर संकरे होते हैं किन्तु कटक इनसे विपरीत अर्थात् नीचे संकरे और ऊपर चौड़े होते हैं । यथा : 20 9१२१३A98471 EURDAR उपयुक्त लोकगिरिकटकके चित्रणमें २० गिरि और १५ कटक प्राप्त होते हैं, इन गिरि और कटक दोनोंका विस्तार एवं ऊँचाई मादि सदृश ही हैं । इनका घनफल इसप्रकार है :
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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