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________________ ६४] तिलोयपण्णत्ती गाथा : २०० स्तम्भोंकी ऊँचाई एवं उसकी प्राकृति धंभुच्छेहा' पुवावरभाए बम्हकप्प-परिणधीसु । एक्क-दु-रण्जु-पवेसे हेट्ठोवरि 'चउ-दु-गहिदे सेढी ॥२०॥ अर्थ :-ब्रह्मस्वर्गके समीप पूर्व-पश्चिम भागमें एक और दो राजू प्रवेश करनेपर क्रमश: नीचे-ऊपर चार और दो से भाजित जगच्छ्रेणी प्रमाण स्तम्भोंकी ऊँचाई है ।।२०।। स्तम्भोत्सेध :---१ राजूके प्रवेश में : राजू; दो राजूके प्रवेशमें ३ राजू । विशेषार्ग :-ऊर्ध्वलोकमें ब्रह्मस्वर्गके समीप पूर्व दिशाके लोकान्तभागसे पश्चिमकी प्रोय एक राजू पागे जाकर लम्बायमान ( अ ब ) रेखा खींचने पर उसकी ऊँचाई : राजू होती है । इसी प्रकार नीचेकी अोर भी ( अ स ) रेखा की लम्बाई १ राजू प्रमाण है। उसी पूर्व दिशासे दो राजू आगे जाकर ऊपर-नीचे क ख और क ग रेखानोंकी ऊँचाई : राजू प्राप्त होती है । यथा १. द. थंभुच्छेहो। २. द. चउदगेहि, ज. ठ, चउदहि, ब. क. चउदुगहिदे ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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