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________________ गाथा : १७३-१७४ ] पढमो महायिारों [ ४७ अर्थ :-ऊलोकसे असनालीको छेदकर मीर उसे अलग रखकर उसका घनफल निकालें । उस घनफलका प्रमाण ४६ से विभक्त लोकके बराबर होगा ।।१७२।। ३४३ ४६ =७ धनराज त्रसनालीका धनफल । बस नाली रहित एवम् सहित ऊर्बलोकका धनफल हिमाल दुरिणदो नरेनो गहिले गोल-खिदि-संखा। तस-खेत सम्मिलिदे लोगो ति-गुरगो अ सत्त-हिदो ॥१७३॥ अर्थ :--लोकको बीससे गुणाकर उसमें ४६ का भाग देनेपर असनालीको छोड़ बाकी ऊर्ध्वलोकका घनफल तथा लोकको तिगुणाकर उसमें सातका भाग देनेपर जो लब्ध प्रावे उतना वसनाली युक्त पूर्ण ऊर्ध्वलोकका घनफल है ।।१७३।। विशेषार्थ :-३४३ ४ २०४६ = १४० धनराजू असनाली रहित ऊर्ध्वलोकका धनफल । ३४३ ४ ३-:-७= १४७ घनराजू सनाली युक्त ऊह्मलोकका धनफल । सम्पूर्ण लोकका घनफल एवं लोकके विस्तार कथनको प्रतिज्ञा घरण-फलमुवरिम-हेट्ठिम-लोयाणं मेलिदम्मि सेटि-घणं । 'वित्थर-रुइ-बोहत्थं वोच्छं जाणा-यियप्येहि ॥१७४॥ अर्थ :-ऊर्ध्व एवं अधोलोकके घनफलको मिला देने पर वह श्रेणीके घनप्रमाण ( लोक ) होता है । अब विस्तारमें अनुराग रखनेवाले शिष्योंको समझाने के लिए अनेक विकल्पों द्वारा भी इसका कथन करता हूं ।।१४।। विशेषार्थ : ऊर्वलोकका घनफल १४७+ १६६ अधोलोकका-३४३ धनराजू सम्पूर्ण लोकका घनफल है । अथवा ७४ ७४७ = ३४३ घनराजू , श्रेणीका घनफल है। १. द. ब, क. ज ठ. वित्थरहि। २ क, ज.ठ. बोहित्थ ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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