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________________ ५३ ) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंका किया जाना विरुद्ध पडता है। नौऊ का भेद करके षष्ठी विभक्तिवाला संबंध करना चाहिये। भेद होने पर षष्ठी विभक्ति हो जाती है। अतः निद्रा आदि पांच का अभेद करके विधेयदल की और दर्शनावरण के साथ संबध कर देनेसे विरोध दोष आता है। ग्रन्थकार कहते हैं कि यह तो नहीं कहना। क्योंकि वक्ता के कथन करने की इच्छा से संबंध हो जाता है "विवक्षातः कारकप्रवृत्तेः" एक सूत्र के दो, तीन, वाक्य बनाकर विवक्षा के वश से भेद और अभेद करके संबध हो जाने का कोई विरोध नहीं है । चक्षुरचक्षुर्दर्शनावरणोदयाच्चक्षुरादींद्रियालोचनविकलः, अवधिदर्शनावरणोदयादवधिदर्शनविप्रयुक्तः, केवलदर्शनावरणोदयादनाविर्भूतकेवलदर्शनः, निद्रानिद्रानिद्रोदयात्तमोमहातमोवस्था, प्रचलाप्रचलाप्रचलोदयाच्चलनातिचलनभावः ॥ एतदेवाह-- चक्षुर्दर्शनावरणकर्म और अचक्षुर्दर्शनावरणाकर्म के उदय से यह जीव चक्षुःइन्द्रिय और स्पर्शनइन्द्रिय, आदि द्वारा होने वाले आलोचन से रहित हो जाता है । तथा »अवधिदर्शनावरणकर्म के उदय से अवधिदर्शन करके विशेषतया छोड दिया जाता है यानी कथमपि अवधिदर्शन नहीं होने पाता है। सर्वघाती हो रहे केवलदर्शनावरण के उदय से इस जीव के केवलदर्शन प्रकट नहीं होने पाता है । एवं निद्राकर्म के उदय से इस जीव के चेतनागुण की अंधकार अवस्था हो जाती है और निद्रानिद्राकर्म के उदय से तो महान् अंधकार अवस्था उपज जाती है । प्रचलाकर्म के उदय से यह जीव चलायमान हो जाता है, बैठा हुआ भी घूमने, ओंघने लग जाता है । शिर, हाथ, पांव, चल जाते हैं, देखता हुआ भी नहीं देखता है । अन्य चार निद्राओं की अपेक्षा इस प्रेचला में सहचारी सातावेदनीय का उदय बढिया है । कतिपय पुरुषों को पलंग पर सो जाने की अपेक्षा बैठे ओघना बडा मीठा, सुखकर अनुभूत होता है । प्रचलाप्रचलाकर्म के उदय से अत्यन्त चलना या कंप परिणाम हो जाता है। बैठा हुआ भी अधिक चक्कर खाता है, सुई आदि करके त्रस्त किया गया भी कुछ नहीं समझता हैं, हाथ पांवों को हला दो, खेंच लो, आंख खोलकर दिखा दो, तो भी होश में नहीं आता है। पांचवीं नीद स्त्यानगू द्धिकर्म के उदय से भयानक कर्म भी करते हुये सोते ही रहना प्रसिद्ध ही है। इस ही सूत्रोक्त रहस्य को ग्रन्थकार अग्रिम वात्तिक द्वारा कह रहे हैं। चतुओं चक्षुरादीनां दशनानां चतुर्विधं । निद्रादयश्च पंचेति नव प्रकृतयोस्य ताः॥१॥ चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन आदिक चार दर्शनों का आवरण करने वाला चार प्रकार का दर्शनावरणकर्म हैं और निद्रा, निद्रानिद्रा आदिक पांच प्रकार का भी दर्शनावरण
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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