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________________ ४६) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे करना, सहपाठियोंके साथ परामर्ष करना आदि उपयोगी कारणोंके मिल जाने पर भी किसी किसी मन्दबुद्धि पुरुषके मति, श्रुत, आदि ज्ञानोंकी विशेष व्युत्पत्तियोंका अभाव देखा जाता हैं। किसीकी अन्यज्ञानवृद्धि देखी जाती है। अतः अनुमानद्वारा निर्यात किया जाता है कि उन उक्त कारणोंसे न्यारा कोई अदृष्ट यानी पौद्गलिक कर्म ही ज्ञानका विघातक लग रहा है वह कर्म हो उन ज्ञान आदिकों का आवरण होने योग्य है । प्रतिभाशालियोंके यहां यह सिद्धान्त निश्चित हो जाता है । कितने ही विद्यार्थी ज्ञानवर्धक कारणोंके मिलजाने पर भी व्युत्पत्तिशून्य देखे जाते हैं, और अनेक छात्र स्वल्पकारणों द्वारा ही विशेष विद्वत्ता को प्राप्त करलेते हैं, मानो ज्ञान भण्डार की ताली मिलगई । अत: अंतरंग कारण होरहे कर्म या कर्मों के क्षयोपशमका अनुमान हो जाता है "कार्यानुमेयानि कारणानि भवंति"। अथदर्शनावरणं, नवभेदं कथमित्याह; ज्ञानावरण की उत्तर प्रकृतियोंके भेद समझलिये, इसके अनन्तर अब दर्शनावरण कर्मके नौ भेद किस प्रकार है ? ऐसी प्रतिपित्सा प्रवर्तनेपर सूत्रकार श्री उमास्वामी महाराज इस अग्रिम सूत्र को कह रहे हैं, दत्तचित्त होकर मुनिये या पढिये । चक्षुरचक्षुरमधिकरलानां निद्रानिद्रानिद्रा प्रचलाप्रचलाप्रचलात्यानगृद्धयश्च।७। चक्षुर्दर्शनका आवरण १ अचक्षुर्दर्शनका आवरण २ अवधि दर्शनका आवरण ३ और केवलदर्शनका आवरण ४ निद्रादर्शनावरण ५ निद्रानिद्रादर्शनावरण ६ प्रचला दर्शनावरण, प्रचलाप्रचला दर्शनावर ग ८ तथा स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण | ये दर्शनावरण कर्मको न उतर प्रकृतियां है । भावार्थ, चाक्षुष मतिज्ञान के पूर्व चक्षुद्वारा होनेवाले सामान्य आलो' चनका आवरण करनेवाला चक्षुर्दशनावरगा है। स्पर्शन, रसना, घ्राण, श्रोत्र और मन इन्द्रियोंद्वारा उपजनेवाले मतिज्ञानके पूर्व होनेवाले महासत्तालोचक अचक्षुर्दर्शनका आवरण करनेवाला अंतरंग कारण अचक्षुर्दर्शनावरण कर्म है । अवधि ज्ञानके प्रथम होनेवाले आलोचक अबधि दर्शनको रोकदेनेवाला अवधि दर्शनावरण कर्म है, केवलज्ञानके साथ होनेवाले महासतालोचक केवलदर्शन का सर्ववाति केवलदर्शनावरण कर्म है, विवेकपूर्ण सत्यार्थ पदार्थों के ज्ञान के कारणभूत दर्शनका पांचो निद्रायें आवरण कर देतो है अत: निद्राओंके सम्पादक पौगलिक कर्म भी सर्वघांती दर्शनावरण कर्म हैं । मद, खेद, परिश्रमों के निवारणार्थ विनोद के लिये सोजाना निद्रा है, निद्रा आज ने पर गमन करता हुआ खडा हो जाता है फिर गिर पडता है इत्यादि क्रिया करता है । निद्रानिद्रा कर्मका उदय हो जानेसे सावधान किया
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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