SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 411
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३८६) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे विद्याबलसे सुग्रीवकी सूरत बदल कर आ गये साहसगति विद्याधरके प्रकरण समान बडे २ अनर्थ या अत्याचार मच जाते, कोई भी सरकार किसी भी प्रकार इसका फैसला नहीं कर पाती। ___ भाइयो ! मनुष्यों, स्त्रियों, लडके, लडकियोंकी सूरतें तो पृथक २ आपको दीख ही रही है । मै तो यह कहता हूं कि घोडे, बैल, भैंस, गाय, हिरण, बन्दर, सर्प, इन सब जीवोंकी भी सूरतें आपसमें एकसी नहीं हैं। यानी जयपुरमें यदि पच्चीस लाख कबूतर हैं तो उनकी एक २ की सूरत भी अलग २ है । आपके घरमें यदि पचास चिडियां हैं तो उन सबकी मूरतें न्यारी २ हैं । जरा उनके बच्चोंसे पूछो वे सब अपनी२ माताको पहचान कर अपनी २ खास मां से शीघ्र लपट जाते हैं। नासमझ और बेवकूफ बच्चेकी बात न्यारी है । इतनाही नहीं, मक्खियां चीटियां, दीमकें, खटमल, बर्र ततैया, मच्छर, मकडियां, मछलियां, मगर, कछुआ आदि ये सबही अपनी २ जातिमें एक दूसरेसे न्यारी २ सूरतवाले होते हैं । मेरे अभिप्रायको आप समझ गये होंगे । मै कह रहा हूं कि सहारनपुरमें कई करोड मविखयां है लेकिन एक २ मक्खीकी सूरत न्यारी २ है । कोई भी मक्खी दूसरी मक्खीसे शकलमें नहीं मिलती है । स्थूलदृष्टिवालोंको वे एकसी दीखती हैं, किन्तु उनकी सूरतें उसी प्रकार न्यारी २ है जैसे कि प्रत्येक कुटुम्बके सब मनुष्योंके शरीरोंके आकार और मुखाकृतियां भिन्न २ हैं। केवल मनुप्योंकी मुखाकृतियां ही न्यारी २ नहीं किन्तु हरएकके पेट हाथ कान अंगुली रोम सभी अंग प्रत्यङ्गोंकी सूरत न्यारी २ है। कोई भेद-विज्ञान कर सके या न कर सके यह दूसरी बात है । आपकी आवश्यकता या अनावश्यकताके साथ वस्तुव्यवस्थाका अन्वय व्यतिरेक नहीं है । टकसालमें सन १९४१ के ढले हुए रूपसे एकसे हैं उनकी आकृतियां समान है । भले ही उनका उपादान कारण भिन्न २ हो इसका यहां विचार नहीं चल रहा है । इसी प्रकार एक सांचीकी बनी हुई ईंटें या एक साथ छुपी हजार पुस्तके एकसी हो सकती हैं । डीवनका लट्ठा अथवा सरोजनीकी मलमल इनके सैकडों थान अथवा एक साथ उसी सांचे में ढले हुये कल पुरजे, एक सूरतवाले हो सकते हैं। हमें इनकी आकृतियां न्यारी २ नहीं सिद्ध करनी है । कैमरामें इनकी तस्वीरें खिंचवावें तो वे तस्वीरें एकसी हों भी, किन्तु उक्त जीवोंके शरीरोंकी आकृतियां समान नहीं है। मक्खियोंके फोटो प्रत्येक रूपसे भिन्न २ हैं।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy