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________________ अष्ठमोध्यायः (१५ कर्मोंका आकर्षण कर स्वकीय कषायों अनुसार स्थितिबंध, और अनुभागबंध करता रहता है, अनादिकालसे कर्मों करके बंधा हुआ यह जीव प्रथमसे ही मूर्त है । कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्त इति पृथग्विभक्त्युंच्चारणं वाक्यांतरज्ञापनार्थं तेन कर्मणो जीवः सकषायो भवति पूर्वोपात्तादित्येकं वाक्यं सकषायत्वात् पूर्वमकर्मकस्य मुक्तवत्स - कषायत्वायोगात् । तथा कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्त जीवः सकषात्वात् इति द्वितीयं वाक्यं कर्मयोग्य पुद्गलादानात्पूर्व पकषामस्य क्षीणकषायादिवत्तवघटनात् ततो जीवकर्मणोरनादि बंध इत्युक्तं भवति बीजांकुरवत् । सकषायत्वकर्मयोग्य पुद्गलादानयोर्भावद्रव्यबधस्वभाव योनिमित्तनैमित्तिकभावव्यवस्थानात् । यहां कोई पण्डित आक्षेप उठाता हैं कि "कर्मणो योग्यान्" ऐसा लघुनिर्देश करना सूत्रकारको उचित था ? इसका आचार्यं समाधान करते हैं कि " कर्मणो योग्यान् पुदगलानादत्ते ” कर्म के योग्य हो रहे पुद्गलोंको ग्रहण कर रहा है इस प्रकार पृथक् विभक्तिका उच्चारण करना तो अन्य वाक्यका ज्ञापन करने के लिये है, तिस कारण वे दो वाक्य यों बन जाते हैं कि "कर्मणः" (पंचमी विभक्तिः) जीवः सकषायो भवति । पूर्व जन्ममे उपात्त किये गये कर्मोंसे उदयापन्न दशामे हो जानेपर जीव कषायसहित हो जाता हैं, यह एक वाक्य हुआ । पूर्वं कर्मों अनुसार सकषाय हो जानेसे ही जीव कर्मोंको ग्रहण करता हैं, कर्मरहित जीवके कषायसहितपनका अयोग है, जैसे मुक्त जीवों के कषाये नहीं होनेसे कर्मबध नहीं होने पाता हैं, विग्रह गति मे भी एक, दो, तीन, समयतक यह जीव तीन शरीरों और छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलों को ग्रहण नहीं कर पाता है, हां, कर्मोंका ग्रहण तो सर्वदा होता ही रहता है, अतः कर्मोंके ग्रहण नहीं करनेमे मुक्त के समान कार्मरणकाययोगी जीव को भी नोकर्म के ग्रहण नहीं करनेमे दृष्टांत कह सकते हैं । तथा कषायसहित होने से यह संसारी जीव कर्मके योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता हैं यह दुसरा वाक्य हैं । समास नहीं करनेपर ही यहां कर्मणः को षष्ठी विभक्तिवाला मानकर दुसरा " कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते" यह वाक्य बना लिया गया है। देखिये कर्मके योग्य पुद्गलोंका ग्रहण करनेसे पहले यदि उपशांत कषाय गुणस्थानवाला जीव अकषाय हो जाता है तो बारहवें क्षीण कषाय आदि गुणस्थानियों के समान उस कर्मपुद्गल का आदान करना घटित नहीं होता है । ग्रन्थकारने यहां पहिले वाक्यमे “ सकषायत्वात्पूर्व अकर्मकस्य " लिखा है । इससे कोई यों अभिप्राय नहीं निकाल लेवे कि पहिले कर्मरहित हो जा चुका भी जीव पुनः कषायसहित होकर कर्मोंका उपार्जन करने लग जाता है। बात यह है कि उपशम श्र ेणी लेचुका जोव कषायसहित
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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