SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 396
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ नवमोध्यायः ३७१) संयमस्थानानि असंख्येयानि व्रजित्वा व्युच्छिद्यते । ततोऽप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमकषायस्थानानि निर्ग्रन्थः प्रतिपद्यते सोप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा व्युच्छिद्यते । तदुपरि एकं संयमस्थानं स्नातको व्रजित्वा परं निर्वाणं लभते । स्नातकस्य संयमलब्धिरनन्तगुणा भवतीति सिद्धम् । - " अवस्थान नामक आठवें अनुयोगका विचार करते हैं--मुनियोंके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायोंका उदय नहीं है । केवल संज्वलन कषाय और नोकषायों का उदय छठेसे दशमे गुणस्थानतक यथायोग्य पाया जाता है । नोकषायका उदय नौमे गुणस्थानतक ही है । मुनियोंके सम्भव रहे कषायों का उदय हो जानेपर भी पुरुषार्थपूर्वक हो रहे आत्मविशुद्धिस्वरूप लब्धिस्थानों को यहां प्रकरणम 11 स्थान माना गया है । जो कि गिनतीमें असंख्यात लोक प्रमाणस्वरूप असंख्याता संख्यात है । अतः जातिकी अपेक्षा संयमके स्थान असंख्यात हैं । एक संयमी मुनिके एक भवमें कतिपय अन्तर्मुहूर्तोंके समयसंख्याप्रमाण असंख्याते संयमस्थान हो जाते हैं । अनादिभूत कालीन अनन्तानन्त संयमियों ( जो अब सिद्धालय में विराजमान हैं ) ने व्यक्तिरूपसे अनन्तानन्त संयमस्थान लिये थे किन्तु उनकी जातियां असंख्यात लोकप्रमाण असंख्याती ही थी । एक जीव पर्यायमें उत्कृष्टतया पोने नौवर्ष कमती एक कोटि पूर्ववर्ष तक संयम धार सकता है । इतने कालमें आवलि या मुहूर्त संख्यातगुणे स्वरूप असं - ख्याते संयमस्थान हो रहे संभव जाते हैं। कितनेही संयमस्थान अनेक बार भी हो सकते हैं । ये संयमस्थान तो कषायोंको निमित्तकारण मानकर हो जाते हैं । संज्वलनकषाय और नोकषायके उदयका तरतमपने करके स्थानोंका भेद हो जाता है । अतः इन स्थानोंके कारण कषाय माने गये हैं । उत्तरोत्तर बढ रही आत्मविशुद्धिको धार रहे असंख्याता संख्यात संयमस्थानोंको पंक्तिबद्ध ऊपर तर ऊपर विराजमान कर दीजिये उनमें सबसे जघन्य कोटिके लब्धिस्थान तो पुलाक और कषायकुशील मुनिके होते हैं । लब्धिस्थानका अर्थ क्या है ? इसका उत्तर यही है कि संयमकें षार्थद्वारा आत्मविशुद्धिरूप संयमस्थान ही यहां लब्धिस्थान है । वे कुशील दोनों मुनि जिनदृष्ट असंख्याते संयमस्थानों तक साथ साथ युगपत् गमन करते हैं । अर्थात् समानरूपसे संयमके उपरितन स्थानोंको पकडते हुये चले जाते हैं । वहांसे उसके अनंतर कषायकुशीलकें साथ गमन कर रहा भी पुलाक मुनि व्युच्छिन्न हो जाता 1 उपयोगी हो रहे पुरुपुलाक और कषाय
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy