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________________ नवमोऽध्यायः किये हैं ततैया, विच्छू, कानखजूरा आदि का ग्रहण नहीं हो सकेगा। आचार्य कहते हैं यह तो न कहना। क्योंकि दंशमशक का उपलक्षण रूप से कथन किया गया है । डंसने वाले डांस जाति के सभी जीवों का ग्रहग हो जाता हैं। उपलक्षण से आदि शब्द के अर्थ की प्रतिपत्ति हो जाती है दंश, मशक, आदि यह अर्थ निकल पडता है। जातरूपधारणं नान्यसहनं संयमे रतिभावादरतिपरीषहजयः। सर्वेषामरति. कारणत्वात् पृथगरतिग्रहणानर्थक्यमिति चेन्न, क्षुदाद्यभावेपि मोहोदयात्तत्प्रवृत्तेः । ___ उत्पन्न हुये बच्चे के समान वस्त्र, भूष गरहित निर्गन्थ स्वरूप को निर्द्वन्द्व धारे रहना नान्यपरीषहजय है। जो पहिले बडे बडे सुन्दर वस्त्रों को धार चुके हैं अपने सुन्दर गोप्य अंगों को कपडों से ढके रहने की टेव रख चुके हैं, उनको संयम अवस्था में बड़े यत्न से नग्नतापरीषहजय करना पडता हैं । संयम में रतिपरिणाम यानी लगन लग जाने से इन में चित्त नहीं लगने देने वाले अरति के एकान्तवास, वननिवास आदि कारणों पर विजय प्राप्त करना अरतिपरीषहजय है। यहाँ कोई पण्डितमानी आक्षेप करता है कि भूख, प्यास, आदि सभी परीषहें अरति के कारण हैं । अत: सभी अरति स्वरूप हैं । फिर अरति का पृथक् निरूपण करना व्यर्थ हैं । ग्रन्थ कार कहते हैं यह तो न कहना । कारण कि क्षुधा, तृषा आदि के न होने पर भो अन्तरंग में मोह का उदय हो जाने से उस परति (अरुचि) की प्रवृत्ति हो जाती है । वर्तमान में अनेक मनुष्यों के कोई भी आकुलता का कारण न होने पर कदाचित् चित्तमें अरतियां उपज जाती हैं। किसी में भी मन नहीं लगता है। योंही विनाकारण खेद आकर घेर लेता है। अतः अरतिका पृथक्ग्रहण करना आवश्यक है। वरांगनारूपदर्शनस्पर्शनादिविनिवृत्तिः स्त्रीपरीषहजयः । व्रज्यादोषनिग्रहश्चर्या विजयः । संकल्पितासनादविचलनं निषद्यातितिक्षा । आगमोदितशयनावप्रच्यवनं शय्यासहनं । यौवनमत्त सुन्दरी स्त्रियों के रूप को देखने और उनका स्पर्श करने, गीत सुनने आदि की विशेषतया निवृत्ति करना स्त्रीपरीषहजय हैं । अधिक गमन करने से उत्पन्न हुये थक जाना, कांटा लग जाना, विवाई फट जाना, भुक्तपूर्व यान, वाहनों का स्मरण करना आदि दोषों का आत्मीय पुरुषार्थ द्वारा निग्रह करना चर्यापरीषहविजय है। काल की मर्यादा बांध कर संकल्प कर लिये गये आसन (बैठे रहना) से विचलित नहीं होना निषद्यापरीषह की तितिक्षा यानी क्षमा (सहना) है। आप्तोक्त शास्त्र में कहे गये मुहूर्तमात्र होने वाले शयन से च्युत हो जाने के प्रज्वल हेतु मिलने पर भी निष्क्रिय बने रहना शय्यापरीषहसहन समझ लेना चाहिये।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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