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शिष्य थे, इस कथनका कोई समर्थन कहीं नहीं मिलता । प्रमेयकमलमार्तडकी प्रशस्ति में माणिक्यनन्दी पदपंकजप्रसादसे शास्त्ररचना करता हूं ' इस अर्थकी उक्ति जरूर है । मगर इस कथन मात्र से इन दोनोके गुरु-शिष्यका साक्षात् संबंध साधित नही होता। ई. सन १०२५ के समय वादिराजसूरिने 'न्याय विनिश्चयविवरण' तथा प्रमाण-निर्णय — इन दो न्यायग्रन्थोंकी रचना की थी और उनमें विद्यानन्दीकी रचना की थी और उनमें विद्यानदीके वाक्योंका उद्धरण किया जरूर है, मगर माणिक्यनन्दीके परीक्षामखका उल्लेख नही किया। इससे प्रतीत होता है कि माणिक्यनन्दी वादिराजसूरिके पूर्वकालीन न होकर निकटवर्ती समकालीन रहे होंगे। ऐसा निर्णय मान्य श्री कोठियाजीका है । लेकिन यहांपर यह भी अनुमान किया जा सकता है कि विद्यानन्दी क ग्रथासे उद्धरण करने के बाद माणिक्यनन्दी के परीक्षामखसे भी उद्धरण करनेकी आवश्यकता उनको नहीं पड़ी होगी। इतनाही नही कोई एक अर्वाचीन ग्रन्थकार द्वारा किसी प्राचीनकालीन ग्रन्थकारका. अपने ग्रन्थमे उल्लेख न करना ही उसके कालनिर्णयमे साधक या बाधक नहीं माना जा सकता । 'विद्यानन्दी' और 'माणिक्यनन्दी 'दोनों समकालीन थे। इस बानका समर्थन करनेवाली नोंपी कथाके पोषक दसरा एक प्रबल साक्ष्याधार भी हमे मिलता है और वह यह है‘श्री पी. बी. देसाई जी के 'जैनीजम इन सौत इन्डिया ' के पृ. ३८८ मे जो विचार प्रकाशित है नीचे दिया जाता है
___" पूर्वकालमें वर्धमान । " गंग घरानेके गुरु थे। इनके । विद्यानन्दी ' और ' माणिक्यनन्दी · नामके दो शिष्य थे। इनमेंसे दूसरा ( माणिक्यनन्दी ) · तार्किकार्क प्रशस्ति प्राप्त था। माणिक्यनन्दीके बाद गणचन्द्र, विमलचन्द्र और गणचन्द्र ये तीनों तीन पीडियोंके क्रमागत शिष्य हुए थे। गुणचन्द्र के गण्डविमुक्त ( प्रथम ] अभयनन्दो ये दो शिष्य थे।"
इस कथनके अनुशीलनसे । विद्यानन्दी ' और 'माणिक्यनन्दी ' ये दोनों एक ही गुरूके समकालीन धर्मभ्राता शिष्योतम थे, इसमे अ. कोई सन्देह ब की नहीं रह जाता।
बह ग्त विद्वान ही सैद्धांतिक ग्रन्थोंका अनुवाद या व्याख्यान लिख सकते हैं, दूसरे नहीं। उन महान ग्रन्थोंमें भी तर्कसणिके ग्रन्थोंका अनुवाद कार्य, सिद्धांत एवं न्यायशास्त्र दोनोंमे परिणत मेधावी पण्डित रत्नोंद्वारा ही संभव है। ऐसे ही पण्डित रत्नोंमे एक 'तरत्न' सिद्धान्तमहोदधि' ' स्याद्वादवारिधि' ' दार्शनिकशिरोमणि' 'न्यायदिवाकर' पं. माणिकचन्दजी न्यायाचार्य फिरोजाबाद-आग्रा भी माने गए हैं। इन्हीं के द्वारा 'तत्त्वार्थ-चितामणि-टीका' रची
तत्त्वार्थ श्लोकवातिक
मूल ग्रन्थ ५१२ पृष्ठोंमें ( केवल मूल प्रति ) पहले प्रकाशित ( छपा ) हुआ है। इसकी पुरानी जीर्ण प्रतिका — मुखपृष्ठ' लुप्त है। इसलिए इस बातका पता लगाना मष्किल है कि इसके प्रकाशक कौन थे। इस समय आचार्य श्री कुन्थुसागर ग्रन्थमाला शोलापुर के प्रकाशनमे