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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः द्वारा या विना तारके विशेष यंत्र द्वारा अधिक दूरवर्ती शद्वोंको भी सुन लिया जाता है। यहां भी विद्युत् शक्ति से फेंके गये शवों को नहीं अपेक्षा कर श्रोत्रका विषय नियत किया गया है । वस्ततः प्राप्यकारी श्रोत्र इन्द्रियके निकट प्रयोगों द्वारा आये हुये शद्वों का ही इन्द्रियजन्य ज्ञान हुआ है । श्री गोम्मटसार में लिखा हुआ जैन सिद्धान्त अकाट्य है । प्रयोगों द्वारा यहां आनेतक अन्य सदृश शब्द बन गये हैं । यों तो सूक्ष्मरूपसे शब्दोंकी परिणति लाखों करोडों योजनांतक हो जाती है । 1 किन्तु योग्यता या दूरतक फेंके जाने अनुसार नियत हो रहे शब्दों को ही श्रोत्र इन्द्रिय जान सकती है । ऋद्धिप्राप्त मुनियोंके इन्द्रियविषय की व्यवस्था ही न्यारी है । यह विषय सूक्ष्म है । त्रिलोक त्रिकालमें अवधित हो रहे और सर्वज्ञकी आम्नायसे चले आ रहे आगमके अनुकूल युक्तियोंद्वारा उक्त सिद्धान्तको आर्थोक्त अनुसार पुष्ट कर लेना चाहिये । इस प्रकार मतिज्ञानका दृष्टान्त देकर मनः पर्ययकी प्रकर्ष प्राप्तिको साध दिया है । परोक्षपन और प्रत्यक्षपनका अन्तर है । इस कारिकामें पडे हुये यथा शब्दका अन्वय तो सूत्रकी नौमी वार्तिकमें उच्चारे गये तथा शब्द के साथ जुडा हुआ है । मतिपूर्वं श्रुतं यद्वदस्पष्टं सर्ववस्तुषु । स्थितं प्रकृष्यमाणत्वात्पर्यंतं प्राप्य तत्त्वतः ॥ ८ ॥ मन:पर्ययविज्ञानं तथा प्रस्पष्टभासनं । ७१ विकलाध्यक्ष पर्यन्तं तथा सम्यक्परीक्षितं ॥ ९ ॥ और जिस प्रकार मतिज्ञानपूर्वक हुआ श्रुतज्ञान ( पक्ष ) सम्पूर्ण वस्तुओंमें अविशद हो रहा सन्ता अन्तिम सीमाको प्राप्त होकर यथार्थ रूपसे स्थित हो रहा है ( साध्य ) अपने विषयोंमें प्रकर्षको प्राप्त हो रहा होनेसे ( हेतु ) तिसी प्रकार मन:पर्यय विज्ञान भी अवधिज्ञान, मन:पर्यय ज्ञानस्वरूप विकल प्रत्यक्षोंकी सीमापर्यन्त अधिक स्पष्ट होकर प्रकाश रहा है । तिस प्रकार हम पूर्व प्रकरणों में इसकी समीचीन परीक्षा कर चुके हैं। क्षायोपशमिक ज्ञानोंमें विकलप्रत्यक्ष बढे हुये हैं और विकलप्रत्यक्षों में मन:पर्ययज्ञान प्रकृष्ट है । इससे अधिक सूक्ष्म विषयको जाननेवाला कोई क्षायोपशमिक ज्ञान नहीं है । हां, क्षायिक केवलज्ञान तो सर्वत्र अप्रतिहतवृत्ति है । प्रकृष्यमाणता त्वक्षज्ञानादेः संप्रतीयते । इति नासिद्धता हेतोर्न चास्य व्यभिचारिता ॥ १० ॥ साध्ये सत्येव सद्भावादन्यथानुपपत्तितः । वेष्टहेतुवदित्यस्तु ततः साध्यविनिश्चयः ॥ ११ ॥ इन्द्रियजन्य ज्ञान और श्रुतज्ञान आदि ज्ञानोंकी स्त्र के प्रकर्षपर्यन्त प्रकर्षता हो रही भले प्रकार प्रतीत हो रही है। इस कारण पक्षमें ठहर जानेसे हेतु असिद्ध नहीं है। तथा इस प्रकृष्यमाणत्व
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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