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________________ ૧૮ तत्वार्थ लोकवार्तिके यह ध्वनित हो जाता है। क्योंकि उन अनादि अनन्त पर्यायोंके ज्ञानको आवरण करनेवाले कर्मोंका क्षयोपशम होना असम्भव है । ज्ञानावरणका उदय होते रहने पर ब्रद्मस्थ जीवों के अनादि अनम्सपर्यायोंका ज्ञान नहीं हो पाता है । अतीतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान कालकी अनन्तानन्तपर्यायों के साथ तदात्मक हो रहे वस्तुका तो सम्पूर्ण ज्ञानावरण कर्मोंके क्षयसे वृद्धिको प्राप्त हुये केवल ज्ञानद्वारा परिच्छेद किया जाता है । अतः वस्तुकी कतिपयपर्यायोंको ही मन:पर्ययज्ञान जान सकता है । अनन्तपर्यायोंको नहीं । कथं पुनस्तदेवंविधविषयं मन:पर्ययज्ञानं परीक्ष्यते इत्याह । किसीका प्रश्न है कि फिर वह इस प्रकारकी वस्तुओंको विषय कर रहा मन:पर्ययज्ञान महा कैसे परीक्षित किया जा सकता है ! बताओ ! इस प्रकार जिज्ञासा होनेपर श्री विद्यानन्द आचार्य उत्तर कहते हैं । क्षायोपशमिकं ज्ञानं प्रकर्षं परमं व्रजेत् । सूक्ष्मे प्रकर्षमाणादर्थे तदिदमीरितम् ॥ ५ ॥ सो यह प्रसिद्ध हो रहा कमौके क्षयोपशमते उत्पन्न हुआ क्षयोपशमिक ज्ञान ( पक्ष ) अपने विषय सूक्ष्म अर्थ में परम प्रकर्षको प्राप्त हो जावेगा ( साध्य ), सूक्ष्म अर्थोको जाननेमें उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा होने से ( हेतु ) । तिस कारण इस प्रकार क्षायोपशमिक चार ज्ञानोंमें यह मन:पर्ययज्ञान अनन्त भाग सूक्ष्म द्रव्यको विषय करनेवाला कह दिया गया है। यही परीक्षा करनेकी प्रधान युक्ति है । न हि क्षायोपशमिकस्य ज्ञानस्य सूक्ष्मेऽर्थे प्रकृष्यमाणत्वमसिद्धं तज्ज्ञानावरणहाने: प्रकृष्यमाणत्वसिद्धेः । प्रकृष्यमाणा तज्ज्ञानावरणहानिर्दानित्वान्माणिक्याद्यावरणहानिवत् । क्षयोपशमिक ज्ञानका सूक्ष अर्थों में तारतम्यरूपसे प्रकर्ष प्राप्त हो रहापन असिद्ध नहीं है । क्योंकि उन ज्ञानों के प्रतिपक्षी ज्ञानावरण कर्मोंकी हानिका उत्तरोत्तर अधिकरूपसे प्रकर्ष हो रहा पन सिद्ध है । जैसी जैसी ज्ञानावरण कर्मोकी हानि बढती चली जायगी, वैसे वैसे ज्ञानोंकी सूक्ष्म 1 को जानने में प्रवृत्ति भी अधिक अधिक होती जायगी । कर्मों की हानिका प्रकर्षमाणपना भी असिद्ध नहीं है । क्योंकि द्वितीय अनुमान इस प्रकार प्रसिद्ध हो रहा है कि उन ज्ञानावरण कर्मोकी हानि (पक्ष) चरमसीमातक उत्तरोत्तर बढती चली जा रही है (साध्य), हानिपना होने से (हेतु) । माणिक, मोती, सुत्रर्ण, आदिके आवरणोंकी हानिके समान ( अन्वय दृष्टांत ) । भावार्थप्रयोगद्वारा शाण आदि पर रगडनेपर जैसे माणिकके या मोतीके पतों में घुसे हुए आवरणकी हानि हो जाती है, अथवा अमिताप या तेजावमें पकानेपर सुवर्णके मलोंकी हानि उत्तरोत्तर बढती जाती
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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