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________________ तत्वार्थचिन्तामणिः विषमान हो रहे प्राह्यग्राहकभाव आदिका निषेध कर रहे हैं, यह समझ लेना चाहिये । उनके उस बानको विपर्ययपना तो ग्राह्यग्राहकभाव आदिकोंकी प्रतीतियोंसे सिद्धि हो जानेके कारण निर्णीत हो रहा है । किन्तु वे पण्डित अपने शास्त्रों और उपदेष्टाओंके वचनसे तिस प्रकार विपरीत (उल्टा) समझ बैठे हैं। इसकी चिकित्सा कष्टसाध्य है। अयवा उनके वचनसे ही उनका विपरीतपना भास जाता है। अपनेको वन्ध्यापुत्र कहनेके समान उनके वचनोंमें ही वदतो व्याघात दोष है। तथा पहिरर्थे भिन्ने सति त(दादमत्त्ववचनं विज्ञानांशप्रकल्पनाविपर्ययः । परमार्थतो बहिरन्तश्च वस्तूनां सादृश्ये सति तदसत्ववचनं सर्ववैसदृश्यावलम्बनेन तथागतस्यैव विपर्ययः। सादृश्यप्रत्यभिज्ञानस्याबाधितस्य प्रमाणत्वसाधनेन सादृश्यस्य साधमात् । सत्यपि च कथंचिद्विशिष्टसादृश्ये तदसत्त्ववचनं सर्वया सादृश्यावलम्बनात् सादृश्यैकान्तवादिनो विपर्ययः। ___ तथा मिन मिन बहिरंग अर्थोके विद्यमान होनेपर भी उन एकान्तवादियोंके समान बौद्धोंके यहां भी विज्ञानके परमाणुस्वरूप क्षणिक अंशोंकी ही कल्पना कर लेनेसे उन बहिरंग अर्थोके असत्त्वका कथन करना विपर्ययवान है । और परमार्थरूपसे बहिरंग अन्तरंग वस्तुओंका सादृश्य होते हुए भी सबके विसदृशपनेका सहारा लेकर उस सादृश्यका असत्व कहना बुद्धके यहा ही विपर्यय प्रसिद्ध हो रहा है । क्योंकि बाधारहित हो रहे सादृश्य प्रत्यभिज्ञानका प्रमाणपना साधन करके वस्तुभूत सादृश्यकी सिद्धि हो चुकी है। इस एकान्तके विपरीत दूसरा एकान्त यों है कि सम्पूर्ण वस्तुओंमें कथंचित् विशिष्ट पदार्थोकी ही अपेक्षासे हो रहे सादृश्यके होनेपर अथवा पदार्थोंमें कथंचित् वैसादृश्य होनेपर सर्वथा सादृश्य पक्षका सहारा ले लेनेसे उस वैसादृश्यका असत्त्व कहना यह सादृश्यको ही एकान्तसे कहनेकी टेव रखनेवाले पण्डितका विपर्यय है । तथा द्रव्यकी पहिले पीछे समयोंमें होनेवाली क्रममावी पर्याय अथवा द्रव्यके सहभावी गुणोंमें द्रव्यकी अपेक्षा एकपना होते हुए भी सदृशपनेका अभिमान करना विपर्यय है । क्योंकि बाधामोंसे रहित हो रहे एकत्व प्रत्यभिज्ञान कर उनका एकपना साध दिया गया है। अतः एक द्रव्यमें या उसकी गुण और पर्यायोंमें उस एकपनेकी सत्ता प्रमाणसिद्ध है। तथा सति द्रव्ये तदसत्ववचनं पर्यायमात्रावस्थानात्कस्याचिद्विपर्ययः । एकत्वमत्यभिज्ञानस्याबाधितस्य प्रमाणत्वसाधनात्तत्सत्त्वसिद्धः । पर्याये च सति तदसववचनं द्रव्यमात्रास्थानादपरस्य विपर्ययः । भेदज्ञानादबाधिताचत्सवसाधनात् । तथा अनादिसे अनन्तकालतक ठहरनेवाली नित्यद्रव्यके सद्भूत होते सन्ते भी केवल पर्यायोंके अवस्थानका ही आसरा ले लेनेसे किसी बौद्ध विद्वान्के यहां उस द्रव्यका असत्त्व कहते हमा विपर्ययवान है । क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे नहीं बाधे गये एकत्व प्रत्यभिज्ञानका प्रमाणपना
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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